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2122 1212 22
नाम दिल से तेरा हटा क्या है ।
पूछते लोग माजरा क्या है ।।

नफ़रतें और बेसबब दंगे ।
आपने मुल्क को दिया क्या है ।।

अब तो कुर्सी का जिक्र मत करिए ।
आपकी बात में रखा क्या है ।।

सब उमीदें उड़ीं हवाओं में ।
अब तलक आप से मिला क्या है ।।

है गुजारिश कि आज कहिये तो ।
आपके दिल में और क्या क्या है ।।

दिल की बस्ती तबाह कर डाली ।
क्या बताऊँ तेरी ख़ता क्या है ।।

बारहा हाल पूँछ मत मेरा ।
मुद्दतों से यहाँ नया क्या है ।।

यूँ मुकरते हो रोज वादों से ।
आँख में भी बची हया क्या है ।।

गिर गए आप वोट की खातिर ।
आपकी शाख़ में बचा क्या है ।।

ख़ुदकुशी कर रहे वो पढ़ लिखकर ।
रोज़ियों पर तेरी रज़ा क्या है ।।

--- नवीन मणि त्रिपाठी

मौलिक अप्रकाशित 

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Comment by Naveen Mani Tripathi on June 21, 2018 at 7:17pm

आ0 गुमनाम पिथौरा गढ़ी जी हार्दिक आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 21, 2018 at 7:16pm

आप नीलम उपाध्याय जी सादर आभार 

Comment by Neelam Upadhyaya on June 20, 2018 at 2:58pm

आदरणीय नवीन मणि जी, नमस्कार। खूबसूरत ग़ज़ल हुई है।  मुबारकबाद कुबूल करें।   

Comment by Samar kabeer on June 19, 2018 at 10:11pm

मुझे भी ओबीओ के बग़ैर चैन कहाँ था ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 19, 2018 at 10:09pm

आ0 तपन दुबे जी हार्दिक आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 19, 2018 at 10:09pm

आ0 बसंत कुमार शर्मा जी सादर आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 19, 2018 at 10:08pm

आ0 गुमनाम पिथौरा गढ़ी साहब सादर आभार 

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 19, 2018 at 10:08pm

आ0 रक्षिता सिंह जी सादर आभार

Comment by Naveen Mani Tripathi on June 19, 2018 at 10:06pm

आ0 गुरदेव कबीर सर को नमन । आपके बगैर 1 महीने ओबीओ में कैसे गुजरा यह तो मेरा दिल जनता है । आपकी कमी बहुत खली । 

Comment by Samar kabeer on June 19, 2018 at 5:58pm

जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, 'ग़ालिब' की ज़मीन मेंअच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

'नाम दिल से तेरा हटा क्या है'

इस मिसरे में 'हटा' की जगह "मिटा" कर दें तो मतले का प्रभाव बढ़ जायेगा ।

'आपने मुल्क को दिया क्या है'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है ' मुल्क को',मुल्क की जगह "देश" कर सकते हैं ।

सातवें के ऊला में 'पूँछ' को "पूछ" कर लें ।

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