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इक आवारा तितली सी मैं
उड़ती फिरती थी सड़कों पे...

दौड़ा करती थी राहों पे
इक चंचल हिरनी के जैसे ...

इक कदम यहाँ इक कदम वहाँ
बेपरवाह घूमा करती थी...

कर उछल कूद ऊँचे वृक्षों के
पत्ते चूमा करती थी...

चलते चलते यूँ ही लब पर
जो गीत मधुर आ जाता था...

बदरंग हवाओं में जैसे
सुख का मंजर छा जाता था...

बीते पल की यादों से फिर
मैं मन ही मन भरमाती थी...

इठलाती थी बलखाती थी
लहराती फिर सकुचाती थी...

हैं आज कदम कुछ ठहरे से
गुमसुम से सहमे सहमे से...

डर डर के बढते हैं ऐसे
जैसे निकले हों पहरे से...

ना गीत जुुुबा पर है कोई
ना जाम हैं शोखनिगहों के...

बस इक टक देखा करती हूँ
कंकड पत्थर इनराहों के...

हैं कदम बड़े डगमग डगमग
यूँ संभल संभल के चलते हैं...

इन ऊँची नीची राहों पर
आगे बढने से डरते हैं...

चलते चलते रूक जाती हूँ
ना जाने क्या हो जाता है...

अधरों पे हँसी लिए ये मन
अंदर अंदर घबराता है...

सबको तो बहुत लुभाती हैं
पर मुझे सताती हैं हर पल...

पांवों में बेड़ी लगती हैं
ये ऊँची एड़ी कीं चप्पल..... !!


( मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Rakshita Singh on June 22, 2018 at 3:18pm

आदरणीया नीलम जी नमस्कार 

आपकी शिर्कत के लिए बहुत बहुत धन्यवाद , आपके द्वारा बताइ त्रुटियों को मैं शीघ्र ही सुधारने का प्रयास करूँगी....कृपया  मार्गदर्शन बनायें  रखे....

Comment by Rakshita Singh on June 22, 2018 at 3:15pm

आदरणीय श्याम जी नमस्कार 

  बहुत बहुत धन्यवाद ।

Comment by Rakshita Singh on June 22, 2018 at 3:15pm

आदरणीय आरिफ जी नमस्कार 

आपकी शिर्कत व हौसला अफजाई केलिए बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Neelam Upadhyaya on June 22, 2018 at 2:42pm

आदरणीय रक्षिता सिंह जी, नमस्कार । चंचलता और शोखी से भरी अच्छी कविता की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई।  छोटी छोटी वर्तनी संबन्धी कमियां सुधार  लें -
घूमाँ की जगह घूमा,   लव की जगह लब, पाँओं की बजाय पाँवों,  जुवाँ की बजाये जुबाँ, ऐड़ी  कीं की जगह एड़ी की ।

Comment by Shyam Narain Verma on June 22, 2018 at 1:25pm
बहुत उम्दा ... बहुत बहुत बधाई   सादर 
Comment by Mohammed Arif on June 22, 2018 at 12:57pm

आदरणीया रक्षिता सिंह जी आदाब,

                              शोख-चंचल, स्वच्छंद अदाओं का अच्छा चित्रण । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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