For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

थप्पड़  -  लघुकथा –

थप्पड़  -  लघुकथा –

आज तीन साल बाद सतीश जेल से छूट रहा था। उसे सोसाइटी के मंदिर में चोरी के इल्ज़ाम में सज़ा हुई थी| घरवालों ने गुस्से में ढंग से केस की पैरवी भी नहीं की थी। । पिछले तीन साल के दौरान भी कोई उसे मिलने नहीं गया था। इसलिये घर में सब किसी अनहोनी  के डर से आशंकित  थे|

जेल से जैसे ही सतीश बाहर आया तो देखा कि उसे जेल पर लेने कोई नहीं आया । उसने कुछ दोस्तों को फोन किये, जो चोरी के माल में ऐश करते थे। लेकिन सब  बहाना बना कर टालमटोल कर गये।

घर पर पहुंच कर पता चला कि उसकी पत्नी उसके जेल जाते ही सदैव के लिये अपने घर वापस चली गयी।

सोसाइटी वालों के तानों से तंग आकर  पिता ने खुदकुशी कर ली ।

माँ अपने कमरे से बाहर भी नहीं आई। जबकि सतीश माँ का सबसे लाड़ला बेटा हुआ करता था। सतीश अंदर गया तो उसे देखकर माँ ने मुँह फ़ेर लिया।

"क्या हुआ माँ? क्या तू भी मुझसे नाराज़ है"?

"तू तो ऐसे पूछ रहा है जैसे युद्ध के मैदान से जंग जीत कर आया है|तूने तो अपनी माँ को भी विधवा बना दिया”|

"तो क्या जो कुछ हुआ, उसका गुनहगार मैं ही अकेला हूँ"?

"अच्छा, तो और लोग भी शामिल थे तेरे इन कुकर्मों में"?

"क्या तुम नहीं जानती कि सबसे अधिक गुनहगार कौन है"?

"मैं कैसे जानूंगी तेरी काली करतूतों के साझीदारों को"?

"माँ, सबसे पहली गुनहगार तो तुम खुद ही हो क्योंकि बचपन मैं जब अपने सहपाठियों की चीजें चुराकर लाता था, तुमने कभी रोका टोका नहीं। बड़े होने पर भी मेरी चोरी की कमाई तुम खुश होकर रख लेती थीं"।

माँ ने गुस्से में सतीश के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया।

"माँ,  बहुत देर कर दी तुमने। काश यह थप्पड़  बचपन में मारा होता “।

मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 937

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by TEJ VEER SINGH on July 3, 2018 at 11:59am

हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।

Comment by Samar kabeer on July 3, 2018 at 11:56am

जनाब तेजवीर सिंह जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Shyam Narain Verma on July 3, 2018 at 10:36am
बहुत सुन्दर ... सादर बधाई स्वीकारें आदरणीय
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 3, 2018 at 12:27am

मुहतरम जनाब  MUZAFFAR IQBAL SIDDIQUI  साहिब, आपकी बढ़िया रचना शायद भूलवश.यहां रिप्लाई बॉक्स/ 'जवाबी टिप्पणी बक्से' में पोस्ट हो गई है। कृपया सही स्थानांतरित कर दीजिएगा।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on July 3, 2018 at 12:23am

एक चिर-परिचित कथानक पर बेहतरीन शैली में उम्दा विचारोत्तेजक लघुकथा के लिये. तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया मुहतरम जनाब तेजवीर सिंह साहिब।

Comment by MUZAFFAR IQBAL SIDDIQUI on July 2, 2018 at 11:29pm

 "असमर्थ "

  (  लघुकथा  )

इनआर्बिट माल से सागर ने आफिस के लिए फॉर्मल ड्रेसेस तो खरीद लीं थीं । अभी और ज़रूरी परचेसिंग बाकी थी ।

 तभी अनायास उसकी नज़र एक टॉय सेन्टर पर पड़ी ।

 एक बड़े से हाल में ,  एक रिमोट कंट्रोल्ड एयरोप्लेन गोल गोल चक्कर लगा रहा था । उसे देखते ही सागर को अपना बचपन याद आ गया ।

अपने होमटाउन के सिटिमार्केट से गुजरते वक़्त ऐसे ही एक खिलौने की दुकान से उसने चावी से चलने वाले हवाई जहाज को खरीदने की जिद की थी और अपनी जिद पूरी करवाने के लिए मचल भी गया था ।

पापा ने शुरू में तो कठोरता से डाँटा फिर प्यार से महीने के आखिरी तारीखों के कारण खरीद पाने में असमर्थता व्यक्त की थी । शायद 

इसके बाद तो कभी किसी चीज़ के लिए जिद करने की इच्छा ही नहीं हुई । 

" एक अजीब सा सब्र घर कर चुका था उसके अन्दर ।"

आज तो हिम्मत करके प्राइज भी पूँछ ही लिया । 

पूरे 800 रु ।

अरे , बहुत मंहगा है । 

अपना सिटी वाला तो उस समय मात्र 100 रु का ही था । सुन्दर पंक्तियाँ  बिल्कुल सही 

अब 20 वर्ष भी तो गुज़र गए हैं  ।

मन ही मन सोचने लगा । 

उसका दिल तो कर रहा था , तुरंत खरीद ले ।

लेकिन फिर पापा का चेहरा सामने आ गया ।

" जैसे बोल रहे हों बहुत मंहगा है ,  बेटा । "

डर लग रहा था , अब कहीं फिर कुछ समझाने न लग जाएं ।

फिर भी खरीदने के पहले एक बार कॉल करके पूँछ तो लूँ ही ।

हेलो पापा , 

हाँ , बेटे 

पापा ,  माल की एक शॉप पर  एक हवाई जहाज मिल रहा है ।

असली का नहीं ,  वही टॉय वाला । 

लेकिन मंहगा बहुत है । 

खरीद लूँ क्या ?

कितने का है ?,  बेटे ।

800 रु का ।

हाँ , बेटे 

अगर तुम्हें पसंद है तो खरीद लो ।

" अरे ,... ... ... 

 पापा ने तो हाँ कर दी । "

वो भी बिना कुछ तर्क वितर्क दिए ।

उन्हें पता है , " कॉलेज केम्पस के बाद मेरे प्लेसमेन्ट की पहली सैलरी मिली है न मुझे , पूरे एक लाख रु ।"

कहीं पापा को मेरे बचपन की हवाई जहाज खरिदने के लिए मचल जाने वाली घटना तो नहीं याद आ गई ।

परन्तु , आज पापा ... ?

  हाँ , लगता है आज पापा बहुत खुश हैं और ... ... ...

  और ...

 " शायद असमर्थता व्यक्त करने में गौरान्वित भी ।"

 - मुज़फ़्फ़र

 - भोपाल 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
12 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Thursday
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

बरसात

बरसात घन गरजे अंधियारी छाई,बिजली अम्बर पर इठलाई  बूँदें टपकी टप-टप भाईरिमझिम रिमझिम बारिश आई पत्ते…See More
Jul 5
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"Dear respected Admin team: A few minutes ago, I typed my suggestion, but lost it all before it was…"
Jul 5
vijay nikore replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"..."
Jul 5
Chetan Prakash replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"  आदरणीय,  तकनीकी दृष्टिकोण से मैं कुछ  अधिक नहीं कह सकता । किन्तु यदि हमारा …"
Jun 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service