For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कविता - नंगे खुले हम्मामों के खेल !

कविता - नंगे खुले हम्मामों के खेल !
 
छोड़ भी दें
संस्कारों के ये झूठे  चोंचले सब
तोड़ डालें औचित्यों के सभी कंचे
चलो खेलें सभी मिलकर
नंगे खुले हम्मामों के खेल !
 
 सभ्यताओं के शहर हैं
और कितने उधड़े हम ,
आओ खुद को बेचें
खरीदार बहुत हैं !
  
तुम अपनी उँगलियाँ
ऊपर उठाओ
और आँखें सामने रखो
दिखेगा सब
न ललचाओ न चाटो
है देना दोष तो उस स्रष्टा को दो
गढ़ा जिसने हमें है
और जिसने सोच की  शक्ति हमें दी !
  
तुम्हारे उपनिषद और वेद सारे
है पढता कौन उनको
ममी की शक्ल में हैं सब ऋषि और कलम वाले
और ठोंगे बन गए हैं  उपनिषद के उधडे पन्ने
चलो उनको उड़ायें
कि हम सब तितलियाँ हैं
फैलाते घोर अपसंस्कृतियों के पराग !
 
                                      {अभिनव अरुण}

Views: 852

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Abhinav Arun on June 25, 2011 at 2:29pm

जी बिकुल सही कहा आपने !! कभी मैंने भी एक विमर्श शुरू किया था फोरम में " नवोदित साहित्यकारों की उपेक्षा क्यों "| अच्छा है की कम से कम ओ बी ओ पर हम इन विन्दुओं पर चर्चा कर अपनी बात कह पा रहे हैं अन्यथा सुनने के अलावा कई मंचों पर हमारी कोई भूमिका रेखांकित नहीं हो पाती !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 25, 2011 at 1:24pm

//रचनाकार की यह भी एक पीड़ा है की वह जो कहना चाहता हैं वह बात समाज तक पहुच नहीं पाती और उसकी प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती | मेरी समझ से यह नयी साहित्यिक पीढी का दर्द भी है " अस्वीकार्यता का दर्द " न पढ़े -- देखे जाने का दर्द //

इस महत्त्वपूर्ण स्वीकारोक्ति के पीछे की टीस और पीड़ा को मैं गहराई से समझ सकता हूँ. साहित्य धर्म कई-कई कारणों से तथ्यपरक वैचारिकता से अक्सर विलग हो जाता है. काव्य-सृजन के माध्यम से सामाजिक उथलेपन को इंगित कर अर्थवान चर्चा की जा सकती है इस मान्यता को नकार देने के कई सामान मौजूद हैं. सहज और आसान या हल्के-फुल्के विन्दुओं और ऐसी भावनाओं पर कुछ कहना अधिक आकर्षित करता रहा है.

फिरभी, मैं इसे विड़ंबना नहीं कहूँगा. यह तो हमेशा से होता रहा है. गंभीर साहित्य का मान्य प्रतिशत भले कम हो किन्तु साहित्य-संस्कार और उसकी दृढ़ता की अगुआई ऐसा साहित्य ही करता है.

 

भाई गणेशजी इन विन्दुओं पर सारगर्भित चर्चा करा रहे हैं - ’क्या हम लेखकों का हक़ मार रहे हैं’ के माध्यम से.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 25, 2011 at 1:01pm

भाई अरुणजी, मैं अपनी पाठकधर्मिता निभा रहा था. आपने मुझे मान दिया है,

इसका हार्दिक धन्यवाद.

 

Comment by Abhinav Arun on June 25, 2011 at 12:42pm

... और श्री saurabh जी हुसैन साहब साहब के चित्र की समीक्षा भी सराहनीय है अगर आज मरहूम होते तो शायद बेहद खुश होते !!!

Comment by Abhinav Arun on June 25, 2011 at 12:40pm

श्री saurabh जी मैं आपकी समीक्षा दृष्टि की गहराई का कायल हूँ आपने वह बातें भी मजबूती से कह और  उठा दीं जो मैं रचना के द्वारा और चित्र को लगाकर प्रभावी ढंग से स्पष्ट नहीं कर सका  ! सही है एक सच्चा समीक्षक एक लचर रचना को भी वज़नदार और प्रभावोत्पादक बना सकता है ! आभारी हूँ आपकी इस प्रोत्साहन देती पंक्तियों के लिए !! क्योंकि मेरे भीतर के रचनाकार की यह भी एक पीड़ा है की वह जो कहना चाहता हैं वह बात समाज तक पहुच नहीं पाती और उसकी प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती | मेरी समझ से यह नयी साहित्यिक पीढी का दर्द भी है " अस्वीकार्यता का दर्द " न पढ़े -- देखे जाने का दर्द  पुनः हार्दिक आभार !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 25, 2011 at 1:28am

एक बात और, रचना के साथ चस्पाँ चित्र ने रचना की आवाज़ को विशेषरूप से प्रतिध्वनित किया है. 

गाँधी की निःशब्द लाठी के समानान्तर ’दासकैपिटल’ को जीता खूँखार कौम्यूनिजम और मृत्यु जनता दानवी नाजीवाद.. और इस हड़बोंग से भौंचक हुआ बेतरतीब यथार्थ. हुसैन के कैनवास पर कभी ये भाव भी तिलमिलाया करते थे.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 25, 2011 at 1:16am

बग़ावत के तेवर अक्सर लसर जाते दीखते हैं यदि कारण स्पष्ट न हो. किन्तु समाज में व्याप गये वही-वहीपन, बेधती हुयी ऊब और चुनचुनाहट भरी वितृष्णा के विरुद्ध आवाज़ उठाती आपकी रचना की चीख निर्बीज कत्तई नहीं है. तभी इसकी ललकार और कटाक्ष की धार इतनी तीक्ष्ण है - ’..तुम्हारे उपनिषद और वेद सारे... चलो उनको उड़ायें/कि हम सब तितलियाँ हैं..फैलाते घोर अपसंस्कृतियों के पराग !..’

अपनी अनगढ़ परिपाटियों को ’नयी सभ्यता’ का नाम देकर भले हम कुछ देर के लिये आत्ममुग्ध हो लें, परन्तु, इसका खोखलपन गहरे सालता है, जब मन उचाट हो तन्हा होता है.

सही है, नंगई भौतिक हो या वैचारिक, उसकी टुच्चई देर तक बांधे रख ही नहीं सकती.

अरुण ’अभिनव’जी आपकी सार्थक विचार-प्रक्रिया का मैं सादर अनुमोदन करता हूँ.  इस विचारपरक रचना के लिये हृदय से धन्यवाद.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 24, 2011 at 11:27pm
स्वागत है भाई अरुण जी !
Comment by Abhinav Arun on June 24, 2011 at 9:15pm
आपका बहुत ही आभार बागी भाई आपकी टिप्पणी मेरे लिए सदा ही बहुमूल्य होती है और प्रेरित करती है |

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 24, 2011 at 10:14am
ममी की शक्ल में हैं सब ऋषि और कलम वाले
और ठोंगे बन गए हैं  उपनिषद के उधडे पन्ने
चलो उनको उड़ायें
कि हम सब तितलियाँ हैं
फैलाते घोर अपसंस्कृतियों के पराग !
खुबसूरत रचना और तेज तेवर , अरुण भाई बहुत ही उम्द्दा अभिव्यक्ति है | इस सृजन पर बधाई स्वीकार करे |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari posted a blog post

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें बेगुनाही और इन्साफ की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप अहिल्या बन…See More
yesterday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
" मान्य,सौरभ पांडे जीआशीष यादव जी , , ह्रदय से आभारी हूँ. स्नेह बनाए रखियगा | सौरभ जी ने एक…"
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें
"आदरणीया अमिताजी, तार्किकता को शाब्दिक कर तटस्थ सवालों की तर्ज में बाँधा जाना प्रस्तुति को रुचिकर…"
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी प्रस्तुति निखर कर सामने आयी है. सभी शेर के कथ्य सशक्त हैं और बरबस…"
Thursday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय नीलेश भाई, आपका स्वागत है.     करेला हो अथवा नीम, लाख कड़वे सही, लेकिन रुधिर…"
Thursday
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय बाग़ी जी एवं कार्यकारिणी के सभी सदस्यगण !बहुत दुखद है कि स्थिथि बंद करने तक आ गयी है. आगे…"
Wednesday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
Tuesday
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
Monday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
Monday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
May 11
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
May 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service