For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल - ग़मों का दौर हूँ मैं

ग़ज़ल - ग़मों का दौर हूँ मैं

ग़मों का दौर हूँ मैं ,

ग़ज़ल है और हूँ मैं |

 

दशहरी गंध तुम हो ,

तुम्हारी बौर हूँ मैं |

 

तेरा हर तिल गिना है ,

नज़र का गौर हूँ मैं |

 

हो तुम सपनीली आँखें ,

उनींदी ठौर हूँ मैं |

 

मुझे सबने सहेजा ,

हाँ अंतिम कौर हूँ मैं |

 

सज़ा बाज़ार में हूँ ,

मगर सिरमौर हूँ मैं |

  

{अभिनव अरुण - मेरा लेखकीय नाम }

Views: 587

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Abhinav Arun on August 12, 2011 at 7:40pm
 गुरु जी निहाल हो गया !! आपका आशीष है शुक्रिया !!
Comment by Rash Bihari Ravi on August 12, 2011 at 7:15pm

मुझे सबने सहेजा ,

हाँ अंतिम कौर हूँ मैं |

 

wahh kya bat hain bahut sundar

 

Comment by Abhinav Arun on August 12, 2011 at 6:51pm

आदरणीय श्री विवेक जी आपने इन अशारों को सराहा मैं आभारी हूँ आपका शुक्रिया !!

Comment by विवेक मिश्र on August 11, 2011 at 12:45pm

ग़मों का दौर हूँ मैं ,

ग़ज़ल है और हूँ मैं |/

मुझे सबने सहेजा ,

हाँ अंतिम कौर हूँ मैं |/

इन दोनों अश'आर के कहन भाव के क्या कहने.. वाह अरुण जी. बधाई.

Comment by Abhinav Arun on August 6, 2011 at 2:02pm

श्री वीनस जी और श्री वीरेंद्र जी आभार ,ग़ज़ल को सराहा आपने !!

Comment by वीनस केसरी on August 6, 2011 at 12:32am

बेहतरीन मतला, लाजवाब ग़ज़ल

 

बधाई

Comment by Veerendra Jain on August 6, 2011 at 12:16am

bahut hi badhiya... Arun ji...badhai swikar karen...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 5, 2011 at 9:36pm

भाई अभिनव अरुणजी,   .. आना यों.. और कुछ कह जाना .. होना बना रहेगा.

इसकी, सही, बहुत ज़रूरत है.

Comment by Abhinav Arun on August 5, 2011 at 9:27pm

आदरणीय श्री सौरभ जी , जानता हूँ यह ग़ज़ल विस्तृत समीक्षा के काबिल नहीं , फिर भी आपकी उदारता , आशीर्वाद मिला , आभारी हूँ !!

Comment by Abhinav Arun on August 5, 2011 at 9:25pm
बागी जी अभिवादन !! इधर कुछ व्यस्तता के कारण कुछ "गहरा " नहीं कह पा रहा हूँ ! कोशिश होती है की ओ बी ओ के आयोजनों में प्रतिभागिता सुनिश्चित कर सकूं |... और इस तरह साहित्यिक काम काज भी चलता रहे | ...धारा से कट जाने का डर सदा रहता है | यह ग़ज़ल भी इसी तौर पर कही गयी और "ताकि सनद रहे " की तर्ज़ पर यहाँ टंकित भी की गयी | साथ ही तुकबंदी सा होने का डर भी सताता रहा अतः एक एक्सक्यूज लिया कह सकते हैं | वैसे अक्सर मेरे साथ होता है की अपनी पुरानी रचना में भी बाद में कमियाँ ही दिखती हैं .. | हो सकता है यह एक रचनाकार का असंतोष ही है जो उसे लिखते जाने को प्रेरित करता है |

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
yesterday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183

आदरणीय साहित्य प्रेमियो, जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध । मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।। प्रेम लोक की कल्पना,…See More
Sunday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 6
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Feb 5
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Feb 5
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Feb 5
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Feb 4
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Feb 4

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Feb 4

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service