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ज़माने की जहालत कम नहीं थी,
इधर अपनी बग़ावत कम नही थी..

लिये ख़ंजर वो देखो ताक में हैं,
हमारी जिस को चाहत कम नहीं थी..

सभी की थी दिखावे की मुहब्बत,
दिलों में वैसे नफ़रत कम नहीं थी..

जहाँ पर ज़िन्दगी की खुशबुएं थी,
उसी महफ़िल में ग़ीबत कम नहीं थी..

हमारे पास रुसवाई की दौलत,
अरे उनकी बदौलत कम नहीं थी..

तुम्हारे पास था ये दिल अमानत,
अमानत में ख़यानत कम नहीं थी..

नहीं था आशना दिल इश्क़ से जब,
बड़ी फ़ुर्सत थी फ़ुर्सत कम नहीं थी..

वो पत्थर था मगर था ख़ूबसूरत,
उस पर भी नज़ाकत कम नहीं थी..

ज़रा सी शेख़ जी को भी चखाते,
शराब ए नाब नुदरत कम नहीं थी..

मुझे सोने में तुलते देखते हो,
मुझे मिट्टी की अज़मत कम नहीं थी..

ग़ज़ल ख़ुद कह के पढ़ना चाहता था,
मगर इसमे भी मेहनत कम नहीं थी..

दिया ज़ोहेब आंधी में जलाते,
हवा की यार दहशत कम नहीं थी..!!

मौलिक एवं अप्रकाशित।

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Comment by Zohaib Ambar on August 3, 2018 at 6:37pm
बहुत बहुत शुक्रिया जनाब समर कबीर साहब, ऐसे ही कर लिया जायेगा।
Comment by Samar kabeer on August 3, 2018 at 6:18pm

//लिये ख़ंजर वो मेरी ताक में हैं//

इस मिसरे को यूँ कर लें ऐब निकल जायेगा:-

'लिये ख़ंजर वो देखो ताक में है'

//दिखावे की मुहब्बत थी सभी की//

इस मिसरे को यूँ कर लें,ऐब निकल जायेगा : 

'सभी की थी दिखावे की महब्बत'

//जहाँ पर खुशबुएँ थीं ज़िन्दगी की//

इस मिसरे को यूँ कर लें ऐब निकल जायेगा :-

'जहाँ पर ज़िन्दगी की खुशबुएँ थीं''

//कहाँ रुसवाई की थी तंग दस्ती//

इस मिसरे को यूँ कर लें ऐब निकल जायेगा :-

'हमारे पास रुस्वाई की दौलत'

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 3, 2018 at 3:24pm

भाई जोहेब जी इस प्रयास के लिए हार्दिक बधाई ...सादर 

Comment by Zohaib Ambar on August 3, 2018 at 1:16pm

मोहतरम जनाब समर कबीर जी इस्लाह के लिये बेहद मशकूर ओ ममनून हूँ, दरअसल मैं शायरी के अलिफ बे से वाकिफ नही बस शौकिया कुछ कहने की कोशिश करता रहता हूँ और गुनगुना कर देख लेता हूँ कि अटक तो नहीं आ रही।

इसके अलावा अब ग़ज़ल की बारीकियां फोरम पर पढ़नी शुरू की हैं इंशाअल्लाह आगे पूरा ध्यान दूंगा।

Comment by Samar kabeer on August 3, 2018 at 11:45am

जनाब ज़ोहेब साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

दूसरे शैर में शुतरगुर्बा दोष है ।

तीसरे,चौथे और पांचवें शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ देखें ।

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