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Zohaib Ambar's Blog (7)

ग़ज़ल

माना नशात ए ज़ीस्त है बेज़ार आज भी,

हम हैं मता ए ग़म के ख़रीदार आज भी..

माना बदल चुकी है ज़माने कि हर रविश,

दो चार फिर भी मिलते हैं गम-ख़्वार आज भी..

बच कर जहां पे बैठ सकें ग़म की धूप से,

मिलता नहीं वो सायए दीवार आज भी..

सुलझेंगी किस तरह मिरि किस्मत की उलझनें,

उलझे हुऐ हैं गेसुए-ख़मदार आज भी..

यारों हमारे नाम से है मयक़दे की शान,

मशहूर है तो हम ही गुनहगार आज भी..

आवाज़-ए-हक़ दबाये दबी है न दब सके,

मन्सूर…

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Added by Zohaib Ambar on January 26, 2020 at 9:55pm — 3 Comments

ग़ज़ल (ज़ख्म सारे दर्द बन कर)

दर्द सारे ज़ख्म बन कर ख़ुद-नुमा हो ही गये,

राज़-ए-पोशीदा थे आख़िर बरमला हो ही गये..

तू ना समझेगा हमें थी कौन सी मजबूरियाँ,

तेरी नज़रों में तो अब हम बे-वफ़ा हो ही गये..

इश्क़ क्या है, क्या हवस है और क्या है नफ़्स ये,

उठते उठते ये सवाल अब मुद्द'आ हो ही गये..

एक मुददत बाद उस का शहर में आना हुआ,

बे-वफ़ा को फिर से देखा औ फ़िदा हो ही गये..

फिर सुख़न में रंग आया उस ख़्याल-ए-ख़ास का,

फिर ग़ज़ल के शेर सारे मरसिया हो ही…

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Added by Zohaib Ambar on October 21, 2018 at 2:45am — 1 Comment

ग़ज़ल (सुन कर ये तिरी ज़ुल्फ़ के मुबहम से फ़साने)

सुन कर ये तिरी ज़ुल्फ़ के मुबहम से फ़साने,

दश्ते जुनुं में फिरते हैं कितने ही दीवाने..

कब साथ दिया उसका दुआ ने या दवा ने,

आशिक़ को कहाँ मिलते हैं जीने के बहाने..

मुमकिन है तुम्हें दर्स मिले इनसे वफ़ा का,

पढ़ते कुँ नहीं तुम ये वफ़ाओं के फ़साने..

इस दौर के गीतों में नहीं कोई हरारत,

पुर-सोज़ जो नग़में हैं वो नग़में हैं पुराने..

इस इश्क़ मुहब्बत में फ़क़त उन की बदौलत,

ज़ोहेब तुम्हें मिल तो गये ग़म के…

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Added by Zohaib Ambar on October 21, 2018 at 2:30am — 3 Comments

किस कि सुनता है (ग़ज़ल)

किसकी सुनता है मन की करता है,

मुँह में रखता ज़बान-ए-गोया है..

हक़ बयानी ही उसका शेवा है,
कब उसे ज़िन्दगी की परवा है..

मौत पर ये जवाब उसका है,
क्या अजब है कि इक तमाशा है..

वो जो हर ग़म में इक मसीहा है,
कौन जाने कहाँ वो रहता है..

क्यूँ ख़्यालों में है अबस मेरे
किस ने ज़ोहेब उसको देखा है..??

मौलिक एवं अप्रकाशित।

Added by Zohaib Ambar on September 11, 2018 at 10:30am — 1 Comment

ग़ज़ल (हर धड़कन पर इक आहट)

हर धड़कन पर इक आहट,
सोचूँ तो हो घबराहट..

यारों उससे पूंछो तो,
क्यूँ है मुझसे उकताहट..

लहजा उसका है शीरीं,
आँखें उसकी कड़वाहट..

मुझसे इतनी दूरी क्यूँ,
हर लम्हा है झुंझलाहट..

उससे हाले दिल कह कर,
देखी उसकी तिर्याहट..!!

मौलिक एवं अप्रकाशित।

Added by Zohaib Ambar on August 25, 2018 at 8:31pm — 3 Comments

ग़ज़ल

ज़माने की जहालत कम नहीं थी,

इधर अपनी बग़ावत कम नही थी..

लिये ख़ंजर वो देखो ताक में हैं,

हमारी जिस को चाहत कम नहीं थी..

सभी की थी दिखावे की मुहब्बत,

दिलों में वैसे नफ़रत कम नहीं थी..

जहाँ पर ज़िन्दगी की खुशबुएं थी,

उसी महफ़िल में ग़ीबत कम नहीं थी..

हमारे पास रुसवाई की दौलत,

अरे उनकी बदौलत कम नहीं थी..…

Continue

Added by Zohaib Ambar on August 3, 2018 at 3:30am — 5 Comments

ग़ज़ल

किसी ने तेरी सूरत देख ली है,

यही समझो क़यामत देख ली है..

अभी अंजाम-ए-दिल मालूम क्या है,

अजी तुमने तो आफत देख ली है..

कि ईजा हिज्र की देखी कहाँ थी,

फ़क़त तेरी बदौलत देख ली है..

चुराता है वो काफ़िर आँख मुझसे,

निगाह-ए-चश्म-ए-हसरत देख ली है..

शराफत आज हमने तर्क कर दी,

ज़माने की शराफत देख ली है..

ज़रा शिकवा किया था आज उनसे,

अरे उल्टी नदामत देख ली है..

संभल जाओ मियां ज़ोहेब तुम भी,…

Continue

Added by Zohaib Ambar on August 3, 2018 at 3:30am — No Comments

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