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ग़ज़ल (ज़ख्म सारे दर्द बन कर)

दर्द सारे ज़ख्म बन कर ख़ुद-नुमा हो ही गये,
राज़-ए-पोशीदा थे आख़िर बरमला हो ही गये..

तू ना समझेगा हमें थी कौन सी मजबूरियाँ,
तेरी नज़रों में तो अब हम बे-वफ़ा हो ही गये..

इश्क़ क्या है, क्या हवस है और क्या है नफ़्स ये,
उठते उठते ये सवाल अब मुद्द'आ हो ही गये..

एक मुददत बाद उस का शहर में आना हुआ,
बे-वफ़ा को फिर से देखा औ फ़िदा हो ही गये..

फिर सुख़न में रंग आया उस ख़्याल-ए-ख़ास का,
फिर ग़ज़ल के शेर सारे मरसिया हो ही गये..

भूल कर उनको नया इक हमसफ़र ढूंढेगें अब,
रास्ते ज़ोहेब उनसे जब जुदा हो ही गये..!!

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 23, 2018 at 5:05pm

वाह बढ़िया ग़ज़ल ज़नाब जोहैब जी..तीसरे शेर में रदीफ़ेन दोष है क्या?

कृपया ध्यान दे...

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