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गजल -सब कुछ तो है सच्चाई में

मस्त हुए वे प्रभुताई में

देश झुलसता महँगाई में

 

घास तलक उगना हो मुश्किल

क्या रक्खा उस ऊँचाई में

 

फटी चदरिया थी जीवन की

वक्त गया सब तिरुपाई में

 

भाप सरीखे उड़ जाते हैं

रिश्ते-नाते कठिनाई में

 

मेरा भारत खोया अब तो 

हिन्दू मुस्लिम ईसाई में

 

भूख, गरीबी, आह, विवशता

सब कुछ तो है सच्चाई में

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 28, 2018 at 12:35pm

आदरणीय समर कबीर जी आपकी इस्लाह का बहुत बहुत शुक्रिया, अभी सुधारता हूँ , सादर नमन 

Comment by Samar kabeer on August 27, 2018 at 12:33pm

इसी तरह मतले के ऊला मिसरे की भी तक़्ति करके देखें ।

Comment by Samar kabeer on August 27, 2018 at 12:11pm

जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बह्र-ए-मीर पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

भारत खोया हुआ आजकल'

ये मिसरा लय में नहीं है:-

भारत/फेलुन

खोया/फेलुन

हुआ आ/121'आ 'की मात्रा गिराएं तो ।

जकल/फ़अल 12

इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:-

'मेरा भारत खोया अब तो'

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 27, 2018 at 10:05am

हृदय से आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' , आदरणीय डॉ छोटेलाल सिंह जी आपका , सादर नमन 

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on August 26, 2018 at 2:03pm

आदरणीय बसन्त कुमार शर्मा जी बेहतरीन यथार्थ पूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत बधाई

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 26, 2018 at 12:24pm

आ. भाई बसंत जी, बहुत खूब गजल हुयी है , हार्दिक बधाई ।

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