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जिगर औ साँस में उतर आई मई (ग़ज़ल, इस्लाह के लिए)

122 212 122 212

ये शेर-ओ-शायरी? मुझे, इश्क़ है भई
सभी से, आप से; किसी ख़ास से नई

क़लम चिल्ला उठी, जहाँ के दर्द से
कुई तड़पा, निगाह नम हो गई

किसी नें राष्ट्र को तरेरी आँख तो
जिगर औ साँस में उतर आई मई

सुनो ए, नाज़नीं घमण्डी होने का
इसे इल्ज़ाम देने को बस तुम नई

महज़ खटती रहीं वो बच्चों के लिए
सभी माताओं की उम्र यूँ ही गई

मौलिक-अप्रकाशित

Views: 104

Comment

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Comment by Samar kabeer on August 31, 2018 at 6:31am

//और क्षमा निवेदन कि आपका कमेंट गल्ती से डिलीट हो गया//

कोई बात नहीं ।

आपका प्रयोग सराहनीय है,लेकिन मैंने भी आपके प्रति अपना फ़र्ज़ ही निभाया है,ख़ुश रहो, सलामत रहो ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 30, 2018 at 11:33pm

और क्षमा निवेदन कि आपका कमेंट गल्ती से डिलीट हो गया

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 30, 2018 at 11:32pm

आदरणीय बाऊजी, दरअसल इस प्रयोग के लिए मेरी कोई ज़िद नहीं है, बस एक प्रयास मात्र है जो निश्चित सिद्धांतों से हर हाल अलग हैं...... इस अलग प्रयोग का एक ही कारण रहा, वो है......जब मैं इश्क़-है पढ़ता हूँ तो उसका उच्चारण इश्क्है उच्चारित होता है।

शेष, यहाँ कोई ज़िद नहीं है.....यह तो एक सीखने के क्रम में बन पड़ी ग़ज़ल है, जरूरी नहीं कि इसे नियमों से ऊपर जाकर स्वीकार करवाने की कोशिश करूँ.......प्रणाम

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 30, 2018 at 7:25pm

122 212 122 212

ये शेरो/शायरी/मुझे इश्/क्है भई
सभी से/आप से/किसी ख़ा/स्से नई

क़लम चिल्/ला उठी/जहाँ के/दर्द से
कुई तड़/पा निगा/ह नम जो/ हो गई

किसी नें/राष्ट्र को/तरेरी/आँख तो
ज़िगर औ/साँस में/चढ़ाई/ है मई

सुनो ए/नाज़नीं/घमण्डी/होने का
इसे इल्/ज़ाम दे/ने को बस/तुम नई

महज़ खट/ती रहीं/वो बच्चों/के लिए
सभी मा/ओं की उम/र यूँ ही तो गई

आदरणीय बाऊजी आपके समझाने का अंदाज़ बहुत खूब रहा। ईमानदारी से कहता हूँ......आपका कमेंट पढ़ के पंकज का ज़िद्दी मन, तपाक से बोल उठा, इसकी तकती'अ करते हैं। लेकिन जैसे ही काम शुरू हुआ, अधिगमकर्ता यानी lerner को ख़ुद ब ख़ुद महसूस हो गया कि.............

1. बह्र से खारिज़ हैं, ग़ज़ल के अधिकांश शेर
2. कोई भी ग़ज़ल पोस्ट करने से पहले पंकज....तकती'अ बहुत ज़रूरी है।

बहुत सारा आभार और विनयवत प्रणाम........ओबीओ मंच यूँ ही आपके बिना अधूरा थोड़े ही लगता है।


पंकज

Comment by Samar kabeer on August 30, 2018 at 2:40pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,इन अशआर की दिये गए अरकान से तक़ती'अ करके देखें,फिर बतएँ कि क्या आप संतुष्ट हैं?

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 29, 2018 at 5:32pm

आदरणीय रवि सर, मत्ला टाइप किये जाने से रह गया, क्षमा चाहता हूँ.....

Comment by Ravi Shukla on August 29, 2018 at 4:20pm

आदरणीय पंकज जी इन अशआर से संदेश तो पहुंच रहा है किंतु किस विधा में इसे लिखा है यह स्पष्ट नहीं है बहर आपने लिखी है और अगर ग़ज़ल की श्रेणी में है तो मतला होना चाहिए मैं अभी गजल के मतले तक नहीं पहुंच सका हूं कृपया स्पष्ट करें। पुनः बधाई

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