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"बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ"

ग़ज़ल

बहुत दिनों से है बाक़ी ये काम करता चलूँ

मैं नफ़रतों का ही क़िस्सा तमाम करता चलूँ

अब आख़िरत का भी कुछ इन्तिज़ाम करता चलूँ

दिल-ओ-ज़मीर को अपने मैं राम करता चलूँ

जहाँ जहाँ से भी गुज़रूँ ये दिल कहे मेरा

तेरा ही ज़िक्र फ़क़त सुब्ह-ओ-शाम करता चलूँ

अमीर हो कि वो मुफ़लिस,बड़ा हो या छोटा

मिले जो राह में उसको सलाम करता चलूँ

गुज़रता है जो परेशान मुझको करता है

तेरे ख़याल से कैसे कलाम करता चलूँ

"समर"हयात का मक़सद बना लिया है यही

चलन वफ़ा का ज़माने में आम करता चलूँ

"समर कबीर"

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on December 30, 2018 at 2:00pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on December 30, 2018 at 12:59pm

अमीर हो कि वो मुफ़लिस,बड़ा हो या छोटा

मिले जो राह में उसको सलाम करता चलूँ --- क्या बात है /क्या नज़रिया है जनाब सही कहा सलाम के लिए क्या अमीर क्या ग़रीब देखना बहुत खूब कलाम के लिए ढेरों दाद  क़ुबूल फरमाएं | 

Comment by Samar kabeer on December 25, 2018 at 12:00pm

जनाब सुरख़ाब बशर साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Surkhab Bashar on December 25, 2018 at 11:56am

जनाब समर कबीर साहब  बहुत उम्दा ग़ज़ल  है 

रह शेर  पे सौ सौ दाद 

मुबारक बाद कु़बूल  करें

Comment by Samar kabeer on December 15, 2018 at 9:55am

क्षमा की कोई बात नहीं भाई, बस ये है कि हमें अपने मंच की परिपाटी का ध्यान हर समय होना चाहिए,आपका पुनः धन्यवाद ।

Comment by अजय गुप्ता on December 15, 2018 at 8:35am

जनाब समर साहब। आप बड़े भाई व मार्गदर्शक हैं। यदि कोई भूल हुई है तो क्षमा चाहता हूं।आगे से ध्यान रहेगा कि ऐसा न हो। 

मैं समझता हूं कि दो-तीन शब्दों की टिप्पणी करना अच्छा नहीं होता। किंतु कईं बार शब्द नहीं मिलते किसी चीज़ का वर्णन करने के लिए। बस मन मे एक भाव आया और वही लिख दिया। यह टिप्पणी नहीं एक मनोस्थिति थी।

Comment by Samar kabeer on December 13, 2018 at 12:25pm

//  अहहहा//

भाई अजय जी आदाब,इतनी मुख़्तसर टिप्पणी?ये तो ओबीओ की परिपाटी नहीं है,बहरहाल आपका शुक्रिया ।

Comment by अजय गुप्ता on December 12, 2018 at 6:26pm

अहहहा

Comment by Samar kabeer on December 10, 2018 at 4:57pm

जनाब सुरेन्द्र इंसान जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by surender insan on December 10, 2018 at 2:46pm

मोहतरम समर साहब आदाब।वाह जी वाह बेहतरीन ग़ज़ल जी। मतले से मकते तक हर शेर लाजवाब।बहुत बहुत दिली मुबारकबाद जी।

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