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"हिन्दी दिवस पर विशेष" हिन्दी ग़ज़ल

कितनी प्यारी ये मनभावन हिन्दी है
भारत की वैचारिक धड़कन हिन्दी है

जो लिखता हूँ हिन्दी में ही लिखता हूँ
मेरी ख़ुशियों का घर आँगन हिन्दी है

रफ़ी, लता,मन्नाडे को तुम सुन लेना
इन सबकी भाषा और गायन हिन्दी है

भारत में कितनी हैं भाषाएँ लेकिन
सारी भाषाओँ का यौवन हिन्दी है

पहले मैं अक्सर उर्दू में लिखता था
अब तो मेरा सारा लेखन हिन्दी है

मुझको तो लगती है ये भाषा अपनी
लेकिन कुछ लोगों की उलझन हिन्दी है

गर्व करे हर भारतवासी ये बोले
मेरे देश की भाषा पावन हिन्दी है

औरों की तो बात "समर" मैं क्या बोलूँ
मेरे माथे का तो चंदन हिन्दी है

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Samar kabeer on January 10, 2019 at 12:00pm

जनाब फूल सिंह जी आदाब,रचना की सराहना के लिए आपका धन्यवाद ।

Comment by PHOOL SINGH on January 10, 2019 at 11:52am

"कबीर " बहुत खूब आपकी रचनाएँ तो दिल कर जाती है उम्दा रचना, बधाई स्वीकारें

Comment by Samar kabeer on November 14, 2018 at 12:21pm

जनाब अशोक कुमार रक्ताले जी आदाब,ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और इस पर आपकी मंज़ूम प्रतिक्रया पाकर मुग्ध हूँ, और आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार भी ।

जवाब देर से देने के लिए माज़रत चाहता हूं ।

Comment by Ashok Kumar Raktale on October 19, 2018 at 9:21pm

तेरा मेरा करें न तनमन हिन्दी है

सत्य कहा है भाषा पावन हिन्दी है

 

उर्दू वाला जब हिन्दी में लिखता है

तब लगता है हर इक धड़कन हिन्दी है

 

गीत भजन और छंद गजल सब सुनता हूँ

लगता है सच पूरा मधुबन हिन्दी है

 

जोड़ रखा है सदियों से इस भारत को,

हर भाषा - भाषी का चन्दन हिन्दी है

 

समर नहीं है कोई हिंदी उर्दू में

उर्दू है गर चूड़ी कंगन हिन्दी है

 

जिसने इसको सीखा है उसने पाया

बिन सीखे तो सचमुच बंधन हिन्दी है

 

गर्व आज मन करता है सचमुच मेरा

जब कहते हैं ज्येष्ठ टनाटन हिन्दी है

 

बारम्बार नमन कर मैं भी कहता हूँ

भाल सजा मनभावन चंदन हिन्दी है

आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमस्कार, हिंदी भाषा के सम्मान में बहुत ही उम्दा गजल आपने कही है. सभी अशआर जैसे नगीने सजे हैं प्रतिक्रिया कुछ विलम्ब दे रहा हूँ क्योंकि मुझे प्रतिक्रिया के लिए कुछ समय की आवश्यकता थी. क्षमा चाहता हूँ. आपको इस उम्दा गजल के लिए  मैं बारम्बार बधाई देता हूँ .सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 24, 2018 at 12:39am

//ग़ज़ल में आपकी ये टिप्पणी भी मुझे मुख़ातिब करती नहीं बल्कि मंच को मुख़ातिब करती हुई प्रतीत हुई //

आदरणीय, आपके माध्यम से ही तो इतना कुछ कहा मैंने। मैं तो अन्यान्य पाठकों से आपकी ग़ज़ल के मार्फ़त बात कर रहा था। वर्ना जितनी बातें मैंने की हैं, आपको तो इसकी जानकारी होगी ही।

अस्तु

Comment by Samar kabeer on September 23, 2018 at 11:40am

प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,ये जानकर वाक़ई बेहद ख़ुशी हुई कि आप और भाभी साहिबा विदेश में भी बच्चों को हिन्दी भाषा का पाठ पढ़ा रहे हैं,इसके लिए मेरी बधाई स्वीकार करें ।

ग़ज़ल आपको पसंद आई लिखना सार्थक हुआ,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

Comment by vijay nikore on September 22, 2018 at 5:42pm

भाई समर जी, हिन्दी के प्रति यह इतनी सशक्त भावपूर्ण गज़ल पढ़ कर आनन्द आ गया। साथ ही सौरभ जी की विस्तार में लिखी प्रतिक्रिया भी गहना है। आपको यह जान कर खुशी होगी कि यहाँ अमरीका में कई भारतीय बच्चे हिन्दी सीख रहे हैं, और मैं और मेरी जीवन साथी कई सालों से यहाँ हिन्दी पढ़ा रहे हैं। बहुत, बहुत बधाई इस सशक्त गज़ल के लिए, प्रिय समर भाई।

Comment by Samar kabeer on September 22, 2018 at 3:05pm

बहना राजेश कुमारी जी आदाब,आप देर से सही ग़ज़ल पर आ गईं,आपकी शिर्कत से ग़ज़ल का मान बढ़ा ।

// मुझको तो लगती है ये भाषा अपनी
लेकिन कुछ लोगों की उलझन हिन्दी है---सच कहा  हिंदी भाषी भी  उनको भी आजकल उलझन होती है हिंदी बोलते हुए लिखते हुए ,मानो इंग्लिश स्टेट्स सिम्बल हो गई .//

इस शैर का एक पहलू तो यही है जो आपने बताया,दूसरा पहलू ये भी है कि कुछ लोग भाषा को भी मज़हब की तरह बाँटने में लगे हैं,उर्दू को मुसलमान बना दिया,हिन्दी को हिन्दू,जबकि मेरे नज़दीक अपने देश में बोली जाने वाली हर भाषा अपनी ही भाषा है,चाहे हम उसे न समझें,लेकिन वो हमारे देश में बोली जाती है इसलिए हमारी ही भाषा है,लेकिन कुछ लोग इस मुआमले में अजीब तरह के तअस्सुब का शिकार हैं,हमारे शह्र के एक शाइर हैं,उनका हाल ये है कि वो हिन्दी में लिखा दावत नामा स्वीकार नहीं करते,लेकिन जब उन्हें हिन्दी में लिखा सिपास नामा(सम्मान पत्र)दिया जाता है तो उसे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं,इस तरह के नमूने दोनों तरफ़ देखे जा सकते हैं ।

आपकी ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 22, 2018 at 12:01pm

भारत में कितनी हैं भाषाएँ लेकिन
सारी भाषाओँ का यौवन हिन्दी है---वाह्ह्ह्हह 

आद० यह प्रस्तुति बहुत देर में पढ़ी इसका मुझे खेद है हर अशआर असरदार जोरदार 

मुझको तो लगती है ये भाषा अपनी
लेकिन कुछ लोगों की उलझन हिन्दी है---सच कहा  हिंदी भाषी भी  उनको भी आजकल उलझन होती है हिंदी बोलते हुए लिखते हुए ,मानो इंग्लिश स्टेट्स सिम्बल हो गई .

बहुत अच्छा लगा यह ग़ज़ल पढ़कर हिंदी का सर गर्व से ऊंचा उठ गया 

हार्दिक बधाई भाई जी 

Comment by Samar kabeer on September 21, 2018 at 11:02pm

जनाब विनय कुमार जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

कृपया ध्यान दे...

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