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मैं

एक पंख  

बिना उद्देश्य से उड़ता 

भाग्य की हवा की चोटी पर अनियंत्रित

हवा की धाराओं पर 

मुझे 

कृपया प्रेरित करे  

शायद एक दिन

भाग्य एक यादृच्छिक हवा 

 मुझे ले जाये

जहां मैं कभी नहीं उड़ा

उस दिशा में

 जो अंततः

मुझे पहुचाये 

आपके करीब

अमोलिक अप्रकाषित 

Views: 435

Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on September 5, 2018 at 6:30pm

आद0 नरेंद्र जी सादर अभिवादन। आद0 समर साहब की बातों पर गौर कीजिए। सादर

Comment by babitagupta on September 5, 2018 at 5:50pm

बेहतरीन रचना ,निराश होकर अपने को भाग्य भरोसे छोड़ना।हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय नरेंद्र सरजी।

Comment by Samar kabeer on September 5, 2018 at 2:38pm

जनाब नरेन्द्र सिंह चौहान साहिब आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखने का नियम है,लेकुन आपने //अमोलिक अप्रकाषित// लिखा है,क्या ये आपकी रचना नहीं है?

कृपया ध्यान दे...

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