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आपकी ओर से जब पहल हो गई

जिंदगी मेरी' कितनी सरल हो गई

 

उस तरफ आँख से एक मोती गिरा

इस तरफ आँख मेरी सजल हो गई

 

आपके रूठने का ये’ हासिल रहा

गुफ्तगू कम से’ कम, पल दो’ पल हो गई

 

घर हमारे पड़े जब कदम आपके  

झोंपड़ी अपनी’ जैसे महल हो गई  

 

प्यार हमने किया कैसे’ इजहार हो  

थी ये’ मुश्किल मगर आज हल हो गई

 

अधखिली थी कली प्रेम की कल तलक

देखिये अब वो’ खिलकर कमल हो गई

 

चंद मिसरे लबों पर लरजते रहे  

धीरे-धीरे मुकम्मल गजल हो गई

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

Views: 948

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2018 at 5:38pm

शुभ संध्या आदरणीय  vijay nikore  जी , आपकी मनभावन प्रतिक्रिया हेतु दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2018 at 5:37pm

शुभ संध्या आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज'  जी , आपकी मनभावन प्रतिक्रिया हेतु दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2018 at 5:37pm

शुभ संध्या आदरणीय Ajay Tiwari जी , आपकी मनभावन प्रतिक्रिया हेतु दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2018 at 5:36pm

शुभ संध्या आदरणीय TEJ VEER SINGH जी , आपकी मनभावन प्रतिक्रिया हेतु दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 24, 2018 at 5:36pm

शुभ संध्या आदरणीय Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' जी , आपकी मनभावन प्रतिक्रिया हेतु दिल से शुक्रिया 

Comment by vijay nikore on September 24, 2018 at 5:21am

गज़ल अच्छी लगी। हार्दिक बधाई आदरणीय बसंत जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 20, 2018 at 6:02pm

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही आदरणीय...

Comment by Ajay Tiwari on September 19, 2018 at 4:28pm

आदरणीय बसंत जी, खूबसूरत अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

Comment by TEJ VEER SINGH on September 19, 2018 at 12:06pm

हार्दिक बधाई आदरणीय  बसंत कुमार शर्मा जी। बेहतरीन गज़ल।

चंद मिसरे लबों पर लरजते रहे  

धीरे-धीरे मुकम्मल गजल हो गई

Comment by बसंत कुमार शर्मा on September 19, 2018 at 9:57am

शुभ प्रभात आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी , आपकी हौसला अफजाई का बेहद शुक्रिया 

कृपया ध्यान दे...

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