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मापनी - २१२२ २१२२ २१२२ २१२ 

चुपके’ चुपके रात में यूँ आता’ जाता कौन है

रोज आकर ख्वाब में नींदें उड़ाता कौन है

था मुझे विश्वास जिस पर दे गया धोखा वही

एक आशा फिर नई दिल में जगाता कौन है

घाव मुझको ज़िन्दगी से कुछ मिले तो हैं, मगर

छेड़कर फिर दर्द इस दिल का बढाता कौन है

बाग में कारीगरी होती दिखी हमको नहीं

फिर वहाँ पर फूल कलियों को बनाता कौन है

जुल्फ की काली घटाएँ छा रहीं रुखसार पर

और उसमे चाँद सा चेहरा दिखाता कौन है

बंद हैं पलकें मगर यूँ खिड़कियों की ओट में  

हौले-हौले प्यार से ये मुस्कुराता कौन है

लग रही सुनसान सी हमको गली ये आपकी

फिर हमें आवाज देकर यूँ बुलाता कौन है

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

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Comment by नाथ सोनांचली on October 13, 2018 at 8:51am

आद0 बसन्त कुमार जी सादर अभिवादन । बढिया सृजन पर कोटिश बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 12, 2018 at 1:34pm

आदरणीय  डॉ छोटेलाल सिंह जी शुभ प्रभातम , आपकी हौसलाफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 12, 2018 at 1:34pm

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज'  जी शुभ प्रभातम , आपकी हौसलाफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 12, 2018 at 1:34pm

आदरणीय Ajay Tiwari जी शुभ प्रभातम , आपकी हौसलाफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 11, 2018 at 5:54pm

आदरणीय वसन्त शर्मा जी बहुत मनमोहक सृजन मन प्रसन्न हुआ बधाई स्वीकार करें

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 11, 2018 at 11:39am

बड़ी अच्छी भावपूर्ण ग़ज़ल कही है आदरणीय..

Comment by Ajay Tiwari on October 10, 2018 at 5:53pm

आदरणीय बसंत जी, अच्छे अशआर हुए हैं. हार्दिक बधाई. 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 10, 2018 at 1:04pm

आदरणीय Samar kabeer  जी शुभ प्रभातम , आपकी हौसलाफजाई का दिल से शुक्रिया, इसे किसी दुसरे तरीके से कहने का प्रयास करता हूँ , सादर नमन आपकी सटीक और सारगर्भित समीक्षा को. यूँ ही स्नेह बनाये रखें 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 10, 2018 at 1:03pm

आदरणीय Shyam Narain Verma  जी शुभ प्रभातम , आपकी हौसलाफजाई का दिल से शुक्रिया 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on October 10, 2018 at 1:02pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'जी शुभ प्रभातम , आपकी हौसलाफजाई का दिल से शुक्रिया 

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