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सामाजिक विद्रूपताओं पर गीत

बात लिखूँ मैं नई पुरानी, थोड़ी कड़वी यार
सही गलत क्या आप परखना, विनती बारम्बार।।

झेल रहा है बचपन देखो,
बस्तों का अभिशाप
सदा प्रथम की हसरत पाले,
दिखते हैं माँ बाप।।
पढ़ो रात दिन नम्बर पाओ, कहना छोड़ो यार
सही गलत क्या आप परखना, विनती बारम्बार।।

गुंडे और मवाली के सिर,
सजे आजकल ताज
पढ़े लिखे हैं झोला ढोते,
पर है मौन समाज।।
सबको चिंता एक यहाँ बस, हो स्वजाति सरकार
सही गलत क्या आप परखना, विनती बारम्बार।।

धर्म कर्म की आड़ लगाए,
हुए कई बदनाम
चाहे राम रहीम रहा हो,
या हो आशाराम।।
कुछ बाबा तो योग तले ही, करते अब व्यापार
सही गलत क्या आप परखना, विनती बारम्बार।।

रोज सवेरे मंदिर जाएं,
और रखें उपवास
माथ भरे का तिलक लगाएँ,
यह इनका विश्वास।।
पढ़े लिखें ना कर्म करें ये, हो कैसे उद्धार
सही गलत क्या आप परखना, विनती बारम्बार।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 907

Comment

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Comment by vijay nikore on September 27, 2018 at 11:25am

आपका यह गीत पढ़ कर आनन्द आ गया। हार्दिक बधाई मित्र सुरेन्द्र जी।

Comment by नाथ सोनांचली on September 26, 2018 at 6:31pm

आद0 समर साहब सादर प्रणाम। रचना पर आपकी प्रतिक्रिया से गर्वान्वित हूँ। प्रतिक्रिया से रचना को पुरस्कृत करने के लिए हृदय से आभार।

दी हुई पंक्ति में मात्रा गड़बड़ है, अभी सुधरता हूँ। पुनश्च आभार

Comment by Samar kabeer on September 26, 2018 at 5:57pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,अच्छा गीत लिखा आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'पढ़े लिखें ना कर्म करें ये, फिर हो कैसे उद्धार'

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