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कल घटना जो भी घटी, नभ थल जल में यार
उसे शब्द में बाँधकर, लाता है अखबार
लाता है अखबार, बहुत कुछ नया पुराना
अर्थ धर्म साहित्य, ज्ञान का बड़ा खजाना
पढ़के जिसे समाज, सजग रहता है हरपल
सबका है विश्वास, आज भी जैसे था कल।1।

जैसा कल था देश यह, वैसा ही कुछ आज
बदल रही तारीख पर, बदला नहीं समाज
बदला नहीं समाज, सुता को कहे अभागिन
लूटा गया हिज़ाब, कहीं जल गई सुहागिन
कचरे में नवजात, आह! जग निष्ठुर कैसा
समाचार सब आज, दिखे है कल ही जैसा।2।

पढ़के खबरें रोज ही, होता चित्त उदास
अब पढ़ना अखबार ही, लगता है बकवास
लगता है बकवास, ख़बर जब हमें रुलाती

कथनी करनी में फर्क, समझ ना जनता पाती
कहीं नोचते जिस्म, सन्त भी दानव बनके
होता बहुत विषाद, सुबह ही यह सब पढ़के।3।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on November 15, 2018 at 8:27am

सुंदर कुण्डलिया लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई भाई सुरेन्द्र जी

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on November 12, 2018 at 4:59pm

आद0 समर कबीर साहब बहुत बहुत आभार आपका,, आपके कथनानुसार परिवर्तन कर दिया है,, पुनश्च आभार

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on November 12, 2018 at 4:58pm

आद0 आली जनाब समर कबीर साहब सादर प्रणाम। आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का हमें रचना पोस्ट करने के तुरन्त बाद से बाट जोहता हूँ। 

पढ़के खबरें रोज ही-- इसमें भूल वस त्रुटि हो गयी है। अभी दुरुस्त करता हूँ।

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on November 12, 2018 at 4:36pm

आद0 शेख शहज़ाद उस्मानी साहब सादर अभिवादन। कुण्डलिया की प्रशंसा से अभिभूत हूँ। हार्दिक आभार आपका।

Comment by Samar kabeer on November 12, 2018 at 2:57pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,अख़बार पर व्यंग करते अच्छे कुण्डलिया छन्द लिखे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

' पढ़के खबरें पढ़कर रोज ही'--?

' खबर सब हमें रुलाती'--इस पंक्ति में 'सब' शब्द लिया तो 'रुलाती' को "रुलातीं" करना होगा,इसलिये इसे यूँ कर लें:-

"ख़बर जब हमें रुलाती"

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 12, 2018 at 2:40pm

बेहतरीन यथार्थपूर्ण, कटाक्षपूर्ण उम्दा कुण्डलिया छंदों के लिए सादर हार्दिक बधाई आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहिब।

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