प्रणय-हत्या
किसी मूल्यवान "अनन्त" रिश्ते का अन्त
विस्तरित होती एक और नई श्यामल वेदना का
दहकता हुया आशंकाहत आरम्भ
है तुम्हारे लिए शायद घूम-घुमाकर कुछ और "बातें"
या है किसी व्यवसायिक हानि और लाभ का समीकरण
सुनती थी क्षण-भंगुर है मीठे समीर की हर मीठी झकोर
पर "अनन्त" भी धूल के बवन्डर-सा भंगुर है
क्या करूँ ... मेरे साँवले हुए प्यार ने यह कभी सोचा न था
गिरते सूखे उढ़ते पत्तों-से अब तुम्हारे बूढ़े हुए बोल
भीतर से उठती भड़कती अग्नि से घिरे हुए तुम
यह शून्याकृति-सी तुम्हारी बाहरी ज़िन्दगी
अपना ही भार न सह सकते तुम्हारे गलित गठीले भाव
चेहरे पर अब प्रतिदिन नकली गंभीर झूठे आश्वास्न ओढ़े
कितना आसान था तुम्हारा कल अपरूप कह देना
अन्तस्तल को बींधते वह पथरीले शब्द ...
" सुनो, बिन्दो, अब मैं तुमसे प्यार नहीं करता"
प्रणय-हत्या !
उफ़्फ़ ! महसूस कर पायोगे क्या ?
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-- विजय निकोर
(मौलिक व अप्रकाशित)
Comment
आ. भाई समर कबीर जी, सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।
प्रिय भाई विजय निकोर जी आदाब,हमेशा की तरह एक सशक्त और गम्भीर भावपूर्ण रचना, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय नरेन्द्र्सिंह जी
आ. भाई शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी, सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।
सुन्दर भावपूर्ण रचना के लिए हार्दिक शुभकामनाये
बेहतरीन बिम्ब और शिल्प में भावपूर्ण रचना हेतु सादर हार्दिक बधाई आदरणीय विजय निकोरे साहिब।
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