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दिले बेक़रार को थोड़ा करार मिल जाए

दिले बेक़रार को थोड़ा करार मिल जाए,

गुलशने वीरां को राहे बहार मिल जाए।

हट जाए ये फ़सुर्दगी मेरे दीदा-ए-मजहूर से,

मेरी माहपारा जो तेरा दीदार मिल जाए।

रख्शे-बेईना सा मन दौड़ता है इधर उधर,

है आरजू कि तुझ सा सवार मिल जाए।

खुश्क आँखों को तलाश अब नमी की है,

तेरे दीदा-ए-तर से अश्क उधार मिल जाए।

मुझे मिल जाए तुझ सी पैकरे-रअनाई ,

तुझे 'चंदन' सा कोई परस्तार मिल जाए।

*******************************************

फ़सुर्दगी - उदासी, दीदा ए मजहूर- वियोग से दुखी नेत्र

माहपारा - चाँद का टुकड़ा, रख्शे बेईना - बेलगाम घोड़ा

दीदा ए तर - सजल नेत्र, पैकरे रअनाई  - सुंदरता की मूर्ति

परस्तार – उपासक

आशीष कुमार
स्वरचित / अप्रकाशित

Views: 443

Comment

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Comment by Ashish Kumar on December 24, 2018 at 3:24pm

आदरणीय समर कबीर जी नमस्कार
सराहना और उत्साहवर्धन के लिए आपका आभार
ये ग़ज़ल बहर पर नहीं लिखी है . बेबह्र ग़ज़ल का प्रयास किया है.

Comment by Samar kabeer on December 22, 2018 at 1:59pm

जनाब आशीष जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

इस ग़ज़ल के अरकान लिख दें तो कुछ कहना हो ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 22, 2018 at 12:19pm

वाह बढ़िया आदरणीय..बहुतखूब...शब्दों के मायने लिख के आपने बहुत अच्छा किया..मापनी और लिख देते तो हम जैसो को और आसानी हो जाये..बधाई

कृपया ध्यान दे...

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