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२१२  २१२  २१२  २१२

क्या पता चाँद रोशन रहे ना रहे

कल ये’ चूड़ी ये’ कंगन रहे ना रहे।

 

भीग जा मेरे’ नैनों की’ बरसात में

क्या पता कल ये’ सावन रहे ना रहे।

 

छू के’ देखूँ जरा अनछुए फूल को

क्या पता कल ये’ मधुबन रहे ना रहे।

 

 मिला लें’ अधर से अधर आज हम

क्या पता कल ये’ यौवन रहे ना रहे।

 

तेरी’ साँसों में’ घुल के महक जाऊँ’ मैं

क्या पता कल ये’ चन्दन रहे ना रहे।

***********************************

स्वरचित एवं मौलिक
आशीष कुमार "चन्दन"

Views: 488

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 22, 2018 at 12:14pm

वाह जी खूब ग़ज़ल कही है..बधाई

Comment by राज़ नवादवी on December 21, 2018 at 11:35am

आदरणीय आशीष कुमार जी, आदाब. ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, दाद के साथ बधाई स्वीकार करें. सादर 

Comment by Ashish Kumar on December 20, 2018 at 4:53pm

आदरणीय समर कबीर जी बहुत बहुत आभार 

Comment by Samar kabeer on December 20, 2018 at 3:10pm

जनाब आशीष कुमार "चन्दन" जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

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