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नज़्म      नया साल

इन दिनों पिछले साल आया था
पेड़ की टहनी पर नया पत्ता
वक्त की मार से हुआ बूढ़ा
आज आखिर वह शाख से टूटा ।

जन्मदिन हर महीने आता था
और वो और खिलखिलाता था
वो मुझे देख मुस्कुराता था
मैं उसे देख मुस्कुराता था ।

जिन दिनों वो जवान होता था
पेड़ पौधों की शान होता था
उस तरफ सबका ध्यान होता था
और वो आंगन की शान होता था ।

उसके चेहरे में ताब होता था
मुस्कुराना गुलाब होता था
और बदन पर शबाब होता था
हर जगह कामयाब होता था ।

धीरे धीरे वो फिर पड़ा पीला
क्यों हुआ ऐसा कुछ नहीं समझा
पहले तो एक दाँत ही टूटा
फिर हुआ उसका तन -बदन झूठा ।

हर कोई दिल को तोड़ जाता है
आँसुओं को निचोड़ जाता है
साथ आखिर में छोड़ जाता है
फुर्र से वक्त दौड़ जाता है ।

वक्त की नींद धीरे से टूटी
मेरी अस्मत तो वक्त ने लूटी
मैं गिरा तो मेरी जगह छूटी

फिर मेरे बाद कोंपलें फूटी ।

सूबे सिंह सुजान

रचना मौलिक व अप्रकाशित है ।

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Comment by सूबे सिंह सुजान on January 4, 2019 at 6:57am

पढ़ने वाले सभी मित्रों को बहुत बहुत आभार और नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ 

Comment by सूबे सिंह सुजान on January 4, 2019 at 6:54am

बृजेश कुमार 'ब्रज', जी बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 3, 2019 at 2:51pm

वाह बहुत ही सुन्दर रचना..बधाई

Comment by सूबे सिंह सुजान on December 31, 2018 at 6:00pm

समर कबीर जी बहुत बहुत शुक्रिया ।

आपकी टिप्पणी सटीक है ।

Comment by Samar kabeer on December 31, 2018 at 4:06pm

जनाब सूबे सिंह सुजान जी आदाब,नववर्ष पर अच्छी नज़्म लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

उसके चेहरे में ताब होता था'

इस पंक्ति में 'ताब' शब्द स्त्रीलिंग है,देखियेगा ।

'  फिलहाल मेरे बाद कोंपलें फूटी'

ये पंक्ति लय में नहीं है,देखियेगा ।

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