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कविता - कौओं के पितृ स्थान

कौए अब अपने पितृ स्थान के लिए
स्कूल के बच्चों के हिस्से में आई
अनुदान राशि को हड़प ले गये ।

और अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए
राजनीति को यूँ अपनाया
कि विधायक, सरपंच मजबूर हैं
सरकारी सहायता को पितृों तक भेजने के लिए ।

अन्य पक्षियों को छोड़कर
केवल कौओं की वोटो की गिनती
के मायने जियादा हैं ।


शेर भी लाचार हैं
वे अब शिकार नहीं करते
वे शिकार हो जाते हैं ।
शेरों को हमेशा
कौओं ने सरकश में नचवाया ।

कबूतरों ने आँखें बंद कर ली हैं
बंदर और तोते सबकी नकल करना भूल कर
अब केवल कौओं की नकल करते हैं ।

कौओं के पेड़ों पर बैठे बैठे
नीम के पेड़
सफेदों में तब्दील हो गये
जामुन और आम
अपने फलों का स्वाद
बचाने में नाकाम हैं ।

दूब घास की जगह
कांग्रेस घास जबरदस्ती
से उगने लगी है
वह बिना बीज बोए उगती है ।

फ़सलें किसानों पर हँसते हुए कहती हैं
कब तक जिओगे?
बैंकों पर कौओं का कब्जा है
अब मरने के लिये पानी और दवाओं की जरूरत है
जीने के लिए नहीं ।

मौलिक व अप्रकाशित रचना 

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Comment

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Comment by सूबे सिंह सुजान on December 3, 2018 at 9:21pm
सभी सुधी जनों का आभार
Comment by सूबे सिंह सुजान on November 27, 2018 at 6:46pm

सभी विशिष्ट जनों से आग्रह करना चाहता हूँ कि इस कविता की समीक्षा करने की कृपा करें । 

मैं इस कविता को देखना चाहता हूँ कि यह किन किन अर्थों में समझी जा रही है या सकती है ।

Comment by सूबे सिंह सुजान on November 27, 2018 at 6:44pm

लक्ष्मण धामी मुसाफिर साहब, 

आपकी आवश्यक टिप्पणी के लिए आभार ।

कविता की यदि आप समीक्षा कर सकें तो बहुत आभार होगा ।

मैं अपनी कविता को देखना चाहता हूँ कि यह किन किन अर्थों में समझी जा रही है या सकती है ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 27, 2018 at 4:25pm

आ. भाई सूबे सिंह जी, बहुत खूब तंज कसा है । हार्दिक बधाई ।

Comment by सूबे सिंह सुजान on November 27, 2018 at 4:00pm

समर कबीर साहब बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Samar kabeer on November 27, 2018 at 3:40pm

जनाब सूबे सिंह सुजान जी आदाब,उम्दा तंज़ करती उम्दा कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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