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उस देश धरा पर जन्म लिया, मकरंद सुप्रीति जहाँ छलके।
वन पेड़ पहाड़ व फूल कली, हर वक़्त जहाँ चमके दमके।
वसुधा यह एक कुटुम्ब, जहाँ, सबके मन भाव यही झलके
सतरंग भरा नभ है जिसका, उड़ते खग खूब जहाँ खुलके।।1।।

अरि से न कभी हम हैं डरते, डरते जयचंद विभीषण से।
मुख से हम जो कहते करते, डिगते न कभी अपने प्रण से
गर लाल विलोचन को कर दें, तब दुश्मन भाग पड़े रण से
यदि आँख तरेर दिया अरि ने, हम नष्ट करें उनको गण से।।2।।

हम काल बनें विकराल बनें, निकलें जब भी अरिमर्दन को।
रण में अरि देख भुजा फड़के, कर दें क्षण में हत दुर्जन को।
फन काढ़ खड़े रण में अरि जो, पल में कुचलें उनके फन को।
हम शावक विघ्न मिटा पथ के, चरितार्थ करें निज जीवन को।।3।।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by नाथ सोनांचली on January 18, 2019 at 9:43am

आद0 फूल सिंह जी सादर अभिवादन। रचना पसंद करने के लिए कोटिश आभार

Comment by PHOOL SINGH on January 10, 2019 at 12:03pm

"सुरेंदर भाई " बहुत अच्छा वीररस के ओतप्रोत रचना के लिए बधाई स्वीकारें

Comment by नाथ सोनांचली on January 9, 2019 at 2:12pm

आद0 विजय निकोर जी सादर आभार

Comment by vijay nikore on January 9, 2019 at 1:13pm

अति सुन्दर प्रस्तुति। बधाई श्री सुरेन्द्र नाथ सिंह जी

Comment by नाथ सोनांचली on January 7, 2019 at 3:39pm

आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम। आपका आशीष पाकर रचना धन्य हुई, सादर आभार।

शिल्प भी लिखने का पूरा प्रयास करूँगा,, चाहता भी हूँ पर कभी कभी पोस्ट करते समय भूल जाता हूँ। वैसे इसका शिल्प

सगण×8, चार सगण के बाद यति और चारों पंक्तियों में तुकांतता समान।

Comment by Samar kabeer on January 7, 2019 at 11:57am

जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब, दुर्मिल सवैया छन्द में अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

जब कोई छन्द रचना पोस्ट करें तो उसके साथ उसका विधान भी लिख दिया करें,जिससे नए सीखने वालों को आसानी हो ।

कृपया ध्यान दे...

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