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विलीन ...

क्या
मिटते ही काया के
सब कुछ मिट जाता है
शायद नहीं
जीवित रहते हैं
सृष्टि में
चेतना के कण
काया के
मिट जाने के बाद भी
मेरी चेतना
तुम्हारी चेतना से
अवशय मिलेगी
इस सृष्टि में
विलीन हो कर भी
काया के मिट जाने के बाद

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 353

Comment

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Comment by Mahendra Kumar on January 7, 2019 at 8:28pm

बढ़िया कविता है आदरणीय सुशील सरना जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.

//अवश्य मिलेगी//

सादर.

Comment by Samar kabeer on January 7, 2019 at 12:07pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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