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एक ताज़ा ग़ज़ल

1222    1222     1222    1222

उदासी घिर के आई है चलो फिर कुछ नया कह दें
पलक को बेवफा कह दें या पैसे को खुदा कह दें

यहाँ से टूट कर जुड़ना नहीं मुमकिन मगर फिर भी
चलो एक बार फिर से आंसुओं को अलविदा कह दें

समंदर सी बड़ी नाकामियां है सामने अपने
ये सोचा है कि अपना नाम मिट्टी पर लिखा कह दें

तुम्हारे आने की उम्मीद की भी क्या जरूरत है
हमें ही लोग शायद कुछ दिनों में जा चुका कह दें

ये धड़कन जिस ने दी है वह भी अपना हो नहीं पाया

किसी बेजान पुतले को भला कैसे सगा कह दें

यही अहसास लेकर अब तलक खाते रहे ठोकर
यें सब पत्थर ही हमसे असली मंजिल का पता कह दें

मौलिक अरे अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ajay Tiwari on January 24, 2019 at 5:50pm

आदरणीय मनोज जी, अच्छे शेर हुए हैं. हार्दिक बधाई.

Comment by Samar kabeer on January 21, 2019 at 10:42pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'पलक को बेवफा कह दें या पैसे को खुदा कह दें'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें ।

'चलो एक बार फिर से आंसुओं को अलविदा कह दें'

इस मिसरे में 'एक' को "इक़" कर लें,लय बाधित हो रही है ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on January 21, 2019 at 12:29pm

आ0 मनोज भाई बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by amod shrivastav (bindouri) on January 20, 2019 at 8:51am

आ मजोज भाई सा , बढ़िया कही है , सादर बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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