एक ताज़ा ग़ज़ल
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उदासी घिर के आई है चलो फिर कुछ नया कह दें
पलक को बेवफा कह दें या पैसे को खुदा कह दें
यहाँ से टूट कर जुड़ना नहीं मुमकिन मगर फिर भी
चलो एक बार फिर से आंसुओं को अलविदा कह दें
समंदर सी बड़ी नाकामियां है सामने अपने
ये सोचा है कि अपना नाम मिट्टी पर लिखा कह दें
तुम्हारे आने की उम्मीद की भी क्या जरूरत है
हमें ही लोग शायद कुछ दिनों में जा चुका कह दें
ये धड़कन जिस ने दी है वह भी अपना हो नहीं पाया
किसी बेजान पुतले को भला कैसे सगा कह दें
यही अहसास लेकर अब तलक खाते रहे ठोकर
यें सब पत्थर ही हमसे असली मंजिल का पता कह दें
मौलिक अरे अप्रकाशित
Comment
आदरणीय मनोज जी, अच्छे शेर हुए हैं. हार्दिक बधाई.
जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
'पलक को बेवफा कह दें या पैसे को खुदा कह दें'
इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें ।
'चलो एक बार फिर से आंसुओं को अलविदा कह दें'
इस मिसरे में 'एक' को "इक़" कर लें,लय बाधित हो रही है ।
आ0 मनोज भाई बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
आ मजोज भाई सा , बढ़िया कही है , सादर बधाई
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