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उम्र ...


गर्भ से चलती है
धरती पर पलती है
आँखों को मलती है
संग साँसों के चलती है
उम्र

जिस्म की दासी है
युग युग से प्यासी है
ख़ुशी और उदासी है
छलती ही जाती है
उम्र

मस्तानी जवानी है
अधूरी सी कहानी है
लहरों की रवानी है
रेत सी फिसल जाती है
उम्र

काल की दुपहरी है
चिताओं पर ठहरी है
ज़माने से बहरी है
धधक जाती है चुपके से
उम्र

कल तक जो चलती थी
आशाओं में पलती थी
लहरों सी मचलती थी
सो जाती है हौले से , अनंत गर्भ में
उम्र

अश्कों को ढोती वो
रिश्तों को धोती वो
अंतस की ज्योति वो
रुक गयी थक कर ,दीवार पर
युगों के लिए
युगों को जीती
अबोले से फ्रेम में
उम्र

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on April 18, 2019 at 11:50am
Comment by Sushil Sarna on April 18, 2019 at 11:50am
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 16, 2019 at 6:04pm

जनाब भाई सुशील सरना साहिब, सुन्दर कविता हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l 

Comment by Samar kabeer on April 14, 2019 at 4:54pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

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