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क्षणिकाएँ :
१.
झाँक सका है कौन
जीवन सत्य के गर्भ में
निर्बाध गति
मौन यति
शाँत या अशांत
बढ़ता है सदा
अदृश्य और अज्ञात लक्ष्य की ओर
हो जाता है सम्पूर्ण
एक अपूर्णता के साथ
एक जीवन

२.

लिख गया कोई
खारी बूँदों से
रक्तिम गालों पर
विरह के
स्मृति ग्रन्थ
रह गई दृष्टि
निहारती
सूने चिन्हों से अलंकृत
अवसन्न से
प्रेम पंथ

३.
हो गई समर्पित
जिसे अपना मान
कर गया वही
अंतस देह को
वासना भाव से
लहूलुहान
बन कर

अंजान

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 550

Comment

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Comment by Sushil Sarna on April 19, 2019 at 8:11pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 19, 2019 at 3:34pm

वाह आदरणीय उम्दा सारगर्भित रचना..बधाई

Comment by Sushil Sarna on April 18, 2019 at 11:52am
Comment by Sushil Sarna on April 18, 2019 at 11:52am
Comment by Sushil Sarna on April 18, 2019 at 11:52am
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on April 16, 2019 at 5:59pm

जनाब भाई सुशील सरना साहिब  , उम्दा क्षणिकाएं हुई हैं मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं l 

Comment by Samar kabeer on April 16, 2019 at 2:58pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी क्षणिकाएँ हुई हैं,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on April 16, 2019 at 12:00pm

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी।बेहतरीन क्षणिकांयें।।

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