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कोई तो दीद के क़ाबिल है आया

1222-1222-122

श'हर  में शोर ये  फैला हुआ है ।।
पडोसी गाँव में मुजरा हुआ है।।

कोई तो दीद के क़ाबिल  है आया ।
यहाँ दो दिन से ही परदा हुआ है।।

वतन की आबरू कैसे बचाए।
म'सलतन आज ही सौदा हुआ है।।

जरा देखूं सराफ़त छोड़ कर के ।
सुना है नाम कुछ अच्छा हुआ है।।

अजां पढ़ ले या बुत की आरती को ।
सभी कुछ आज कल धंधा हुआ है।।

हमारे देश की हालत बुरी अब।
बुलंदी खोर हर तबक़ा हुआ है ।।

गले को फाड़ कर चीघे भी कितना ।
जमाना दूर तक बहरा हुआ है ।।

कई हिन्दू ओ मुस्लिम घर  जले हैं।
ये दंगा किसका' अब भेजा हुआ है।।

किसी को कुछ न कहना ठीक है जी ।
सियासी शख़्स तो नंगा हुआ है।।

म'सअले देर तक ना फडफ़ड़ाएं।
विपक्षी संग समझौता हुआ है ।।

हुई जब से मुहब्बत दिल का मेरे।
ऐरा गैरा नत्थू खैरा हुआ है।।

आमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित

 

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Comment

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Comment by Hariom Shrivastava on April 28, 2019 at 10:02pm

वाह,वाहह,सुंदर ग़ज़ल

Comment by amod shrivastav (bindouri) on April 27, 2019 at 2:18pm

आ समर दादा नमन ,मार्ग दर्शन के लिए शुक्रिया

Comment by Samar kabeer on April 23, 2019 at 3:39pm

जनाब आमोद बिंदौरी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

शिल्प और व्याकरण पर क़ाबू पाना अतिआवश्यक है,ध्यान दें ।

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