कभी किसी को ना करे, भूख यहाँ बेहाल
रोटी सब दो जून की, पाकर हों खुशहाल।१।
मुश्किल से दो जून की, रोटी आती हाथ
खाने को यूँ आज तो, मिल बैठो सब साथ।२।
रोटी को दो जून की, अजब गजब से खेल
इसकी खातिर जग करे, दुश्मन से भी मेल।३।
रोटी को दो जून की, क्या ना करते लोग
झूठ ठगी दैहिक व्यसन, सब इसके ही योग।४।
रोटी बिन दो जून की, बिलखाती है भूख
रोटी पा दो जून की, ढूँढें लोग रसूख।५।
सदा भाग्य ने है लिखा, निर्धन के घर झोल
रोटी को दो जून की, अस्मत से ले मोल।६।
पड़ी जलावन पर यहाँ, मँहगाई की मार
रोटी तब दो जून की, कैसे पकती यार।७।
रोटी से दो जून की, इक है कोसों दूर
खाना खर्चा एक को, किस्मत से भरपूर।८।
सरकारें निश्चिंत अब, नित कर मँहगा नून
जनता का मुश्किल हुआ, कटना यूँ दो जून।९।
मेहनतकश फाका करे, कामचोर की मौज
रोटी को दो जून की, जुटती सबकी फौज।१०।
मौलिक अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
Comment
आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन। दोहों की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।
आ. नीलम जी, सादर आभार।
आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। प्रशंसा व मार्गदर्शन के लिए आभार।
दोहे अच्छे लिखे हैं।। बधाई, लक्ष्मण जी
आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर जी, नमस्कार। अच्छे दोहे लिखे हैं। बधाई स्वीकार करें ।
जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर जी आदाब,अच्छे दोहे लिखे आपने,इसके लिए बधाई स्वीकार करें ।
'कभी किसी को ना करे, भूख यहाँ बेहाल
रोटी सब दो जून की, पाकर हों खुशहाल'
इस दोहे की तुकांतता क्या है? ग़ौर करें ।
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