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किस तरह होते फ़ना प्यार निभाने के लिए (४६ )

कैसे होते हैं  फ़ना प्यार निभाने के लिए 
छोड़ जाऊंगा नज़ीर ऐसी ज़माने के लिए 
**
रूह का हुस्न जिसे दिखता वही आशिक़ है 
जिस्म का हुस्न तो होता है लुभाने के लिए 
**
दरमियाँ गाँठ दिलों के जो पड़ी कब सुलझी 
कौन दीवार उठाता है गिराने के लिए 
**
अच्छे लोगों की कमी रहती है क्या जन्नत में 
क्यों ख़ुदा उनको है तैयार बुलाने के लिए 
**
आग को देना हवा काम बचा लोगों का 
कोशिशें कोई न करता है बुझाने के लिए 
**
दाँत खाने के जुदा जिनके दिखाने के जुदा 
लोग ऐसे हैं ख़तरनाक ज़माने के लिए 
**
दिन ब दिन और हुए जाते हैं हालात बुरे 
कौन आता है ग़रीबों को बचाने के लिए 
**
अपने हिस्से के ग़मों को तुझे सहना है 'तुरंत' 
दूसरा कौन है ये बोझ उठाने के लिए 
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी |

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on Wednesday

बे'पनाह, मुहब्बतों, नवाज़िशों का दिल से बे'हद शुक्रिया ! शाद-औ-आबाद रहें आदरणीय Samar kabeer साहेब   

Comment by Samar kabeer on June 11, 2019 at 12:30pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

'किस तरह होते फ़ना प्यार निभाने के लिए'

इस मिसरे को यूँ कर लें,इसमें 'हज़फ़-ए-लफ़्ज़ का ऐब है:-

'कैसे होते हैं फ़ना प्यार निभाने के लिए'

 
'उम्र लग जाती हैं बुनियाद लगाने के लिए'

इस मिसरे में 'बुनियाद' के साथ 'लगाने' की तरकीब दुरुस्त नहीं,विचार करें ।

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