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मिटाने फासले तुझको अगर है गुफ़्तगू कर ले (५५ )


मिटाने फासले तुझको अगर हैं  गुफ़्तगू कर ले 
सियेगा ज़ख्म कोई सोच मत ख़ुद ही रफ़ू कर ले 
**
मुक़ाबिल ख़ौफ़-ए-ग़म होजा अगर पीछा छुड़ाना है
ग़मों से भाग मत इक बार तू रुख़ रूबरू कर ले 
**
नहीं महफ़ूज़ गुलशन में कली कच्ची अभी तक भी 
बचा है कौन अब उसकी जो फ़िक्र-ए-आबरू कर ले 
**
कोई तो दर्द है दिल में लबों पर आ नहीं पाता 
वगरना कौन है जो चश्म दोनों आबजू कर ले 
**
नहीं तूने ख़ता कोई अगर की ख़ौफ़ किसका है 
नहीं मुमकिन कोई मर्ज़ी से अपना ज़र्द-रू कर ले 
**
छुपाएगा अगर ग़म को बढ़ेगा दर्द ज़िद मत कर 
यही बेहतर किसी के साथ तू ग़म को नुमू कर ले 
**
हमेशा सुनता आया है खुदा मौज़ूद है अंदर 
अकेले बैठकर ख़ुद की कभी तू जुस्तजू कर ले 
**
अगर पाकीज़गी दिल में नहीं तेरे 'तुरंत 'अब तक 
खुदा कैसे मिलेगा लाख चाहे तू वुजू कर ले 
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी |
२६ /०७/२०१९
(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 30, 2019 at 7:03pm

कमियों पर नज़र डालकर दुरुस्त करवाने के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीय समर कबीर साहेब ,सादर नमन | 

Comment by Samar kabeer on July 30, 2019 at 2:40pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'मिटाने फासले तुझको अगर है गुफ़्तगू कर ले'

इस मिसरे में 'फ़ासले' शब्द बहुवचन है,इस कारण 'है' को "हैं" कर लें ।

'अगर इंसान कोई ठीक से पहले शुरू कर ले'

इस मिसरे में क़ाफ़िया दोष है,सहीह शब्द है "शुरू'अ''और इसका वज़्न 121 होता है,देखियेगा ।

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