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बीच समंदर कश्ती छोड़े धोका गर मल्लाह करे (५४)

बीच समंदर कश्ती छोड़े धोका गर मल्लाह करे 
मंज़िल कैसे ढूंढोगे जब रहबर ही गुमराह करे 
**
आज हुआ है इंसानों में प्यार मुहब्बत क्यों ग़ायब 
घर घर की चर्चा है अपने अपनों से ही डाह करे 
**
पानी मांग नहीं पाता है साँपों का काटा जैसे 
ऐसा काम भयानक अक़्सर मज़्लूमों की आह करे 
**
आज अक़ीदत और इबादत का जज़्बा गुम सा देखा 
दिल में जब विश्वास नहीं तो क्या अपना अल्लाह करे 
**
महँगाई की मार वतन में आज हुई इतनी भारी 
इस हालत में क्या बेचारी छोटी सी तनख़्वाह करे 
**
दिल तोड़ोगे यार किसी का चैन कहाँ फिर पाओगे 
कोई बन्दा भूले से ये मत संगीन गुनाह करे 
**
अपनी अपनी फ़िक्रों में मश्ग़ूल यहाँ सब रहते हैं 
कौन किसी की इस दुनिया में कैसे फिर परवाह करे 
**
जबरन घुस आती हैं घर में वो अक़्सर मेहमाँ बनकर 
वरना कौन मुसीबत से ख़ुद जाकर यार निकाह करे 
**
एटम बम के ख़तरे से अब कौन रहा महफ़ूज़ 'तुरंत '
ख़ाक हिफ़ाज़त जनता की अब जूना शह्र-पनाह करे 
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी | 

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on July 24, 2019 at 8:42pm

बहुत बहुत शुक्रिया समर सर जी ,आपकी नज़रसानी के लिए | है भी बड़ी छोटी होती है मुझे पता ही नहीं इसलिए ये गड़बड़ हुई है | सादर नमन | 

Comment by Samar kabeer on July 24, 2019 at 12:25pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'घर घर की चर्चा है अपने अपनों से ही डाह करे'

इस मिसरे में रदीफ़ 'करे' की बजाय "करें" हो रही है,ग़ौर करें ।

'वरना कौन मुसीबत से ख़ुद जाकर यार निकाह करे '

इस मिसरे में क़ाफ़िया दोष है,आपके क़वाफ़ी 'ह' ख़फ़ी' के हैं और 'निकाह' शब्द में बड़ी "ह" होती है, देखियेगा ।

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