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एक ग़ज़ल मनोज अहसास इस्लाह के लिए

2×15

इस दुनिया में एक तमाशा जाने कितनी बार हुआ
वो दरिया में डूब गया जो तैर समंदर पार हुआ

अच्छे दिन की चाहत वालों ऐसी भी क्या बेताबी
चार नियम बनते ही बोले जीना ही दुश्वार हुआ

एक पहाड़ी पर शीशे के घर में बैठा बाजीगर
नाच नचाकर देख रहा है कौन बड़ा फनकार हुआ

तुमने अपने मातम पर भी खर्च किया मोटा पैसा
और किसी निर्धन के घर में मुश्किल से त्यौहार हुआ

चार कदम की दूरी पर थी मंजिल जब दम टूट गया
लेकिन यह भी बात बड़ी है चंदा का दीदार हुआ

कौन सुरीले गीतों से अब अपने दिल को बहलाये
दिल से लिखना,दिल से गाना इस युग में बेकार हुआ

कुछ छोटे-छोटे बच्चों ने राज खुशी का बतलाया
आओ खेले खेल सुहाने मुश्किल से इतवार हुआ

जिसको ईश्वर से भी पहले दुनिया शीश झुकाती थी
उपहास,निरादर,अपमानों आज वही हकदार हुआ

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on September 10, 2019 at 11:51am

जनाब मनोज कुमार अहसास जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'तुमने अपने मातम पर भी खर्च किया मोटा पैसा 

इस मिसरे में 'मोटा' की जगह "कितना" शब्द उचित होगा ।

'उपहास,निरादर,अपमानों आज वही हकदार हुआ'

इस मिसरे की लय बाधित है,देखिये ।

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