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मैं बीज पड़ा तेरे आँगन में
तेरी आर्द्रता से अंकुरण है
ये तन पौध बना फिर देख बढ़ा
तेरा होना मेरा सर्जन है।

कल-कल बहती हैं नदियाँ तुझ पर
मीठे-मीठे गीत सुनातीं हैं
जीवन को सींच रही हैं पल-पल
हरियाली को लेकर आतीं हैं
नित चलती पथ पर ये बिना रुके
आगे को ही बढ़ती जातीं हैं
बाधाओं को पार करें कैसे
ऐसा सबको पाठ पढ़ातीं हैं।

फिर मीत सिंधु के जा साथ मिलें
दिख जाता क्या प्रेम समर्पण है?
ये तन पौध बना फिर देख बढ़ा
तेरा होना मेरा सर्जन है।

दुनिया भर में जो मौसम हैं वे,
तेरे आँगन धूम मचाते हैं ।
नाना विधि के फल वे ला-लाकर,
सबको सुख से तर कर जाते हैं ।
जब फसलें पक कर लहराती हैं
त्योहार कईं तब-तब आते हैं
ऋतु-मेला हो तेरे आँचल में,
सब मिलकर खुशी मनाते हैं।

हे पुण्य धरा! हे स्वर्गमयी! माँ!
हृदय पुष्प से तेरा अर्चन है।
ये तन पौध बना फिर देख बढ़ा,
तेरा होना मेरा सर्जन है।

कोई सिर बिन साया रहे नहीं
सबको ही दिन-रैन बसेरा हो
सारे पेट अन्न से पूर्ण रहे
कहीं भूख का कभी न डेरा हो
ठंड- धूप से हर तन की रक्षा
खातिर, वसन यहाँ बहुतेरा हो
साहस से सब मिलकर साथ लड़ें
जब संकट का कोई घेरा हो।

आनन्द रहे शुद्ध वायु जल से,
अब ईश्वर से यही निवेदन है।
ये तन पौध बना फिर देख बढ़ा,
तेरा होना मेरा सर्जन है।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 5, 2019 at 6:51am

आदरणीय समर कबीर सर, सादर वन्दे। उत्साहवर्धन के लिए सादर आभार। सर्जन: सृजन जैसे ही अर्थ में लिया गया है। सादर

Comment by Samar kabeer on November 4, 2019 at 2:42pm

जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब, अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'तेरा होना मेरा सर्जन है'

इस पंक्ति में 'सर्जन' या 'सृजन'?

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