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नहीं अच्छा है यूँ मजबूर होना- ग़ज़ल

1222 1222 122
नहीं अच्छा है यूँ मजबूर होना
दिखें हैं साथ लेकिन दूर होना।

कली का कुछ समय को ठीक है, पर
नहीं अच्छा चमन, मगरूर होना।

अँधेरों से उजालों का है रस्ता
चिरागों का थकन से चूर होना।

कोई कहता इसे वरदान है ये
खले लेकिन किसी को हूर होना।

अभी सूखा नहीं रख ले तसल्ली
दिखेगा ज़ख्म का नासूर होना।

कदम तो चूम लेगी जीत तेरे
है बाकी बस तुझे मंजूर होना।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on September 23, 2019 at 2:56pm

जनाब सतविन्द्र कुमार राणा जी आदाब,आपकी इस ग़ज़ल के किसी भी शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,फिर से प्रयास करें ।

Comment by surender insan on September 20, 2019 at 8:20pm

अच्छी ग़ज़ल हुई हक़ी सतविंदर भाई जी। मुबारकबाद कबूल करे।

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