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महकता यौवन/ विमल शर्मा 'विमल'

उठे सरस मृदु गंध, महकता यौवन तेरा।
देख जिसे दिन रात ,डोलता है मन मेरा।
अधर मधुर मुस्कान, छलकती मय की प्याली।
चुभती बनकर शूल, चमकती तेरी बाली।
क्षण भर भी तुमसे दूर, नहीं अब रह पाऊँगा।
न तुम ऐसे शरमाओ, कसम से मर जाऊँगा।

गोरे गोरे गाल, दामिनी द्युति सम चमकें।
हृदय लगाती आग, अधखुली तेरी पलकें।
चंचल तेरा रूप, केश हैं उस पर उलझे।
करे ठिठोली आज, नहीं अब तुमसे सुलझे।
तेरे नैनों का वार, नहीं अब सह पाऊँगा।
न तुम ऐसे शरमाओ, कसम से मर जाऊँगा।

कंचन ज्योतित देह, कुमुदिनी सी सुकुमारी।
सहज चुराती चित्त, सुवासित आभा प्यारी।
विधु तनया साकार, धरा पर नित मदमाती।
अंग अंग रस रंग, नित्य मकरंद लुटाती।
मृगनयने आजा पास, नेह अति बरसाऊँगा।
न तुम ऐसे शरमाओ, कसम से मर जाऊँगा।

- विमल शर्मा 'विमल'
स्वरचित एवं अप्रकाशित

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Comment by विमल शर्मा 'विमल' on May 31, 2020 at 2:54pm
आदरणीय आशीष यादव जी बहुत बहुत धन्यवाद आपका।
Comment by आशीष यादव on December 15, 2019 at 6:18pm

बहुत सुंदर, बहुत सुंदर।

Comment by विमल शर्मा 'विमल' on December 14, 2019 at 8:12pm
आदाब आदरणीय समर कबीर साहब ...उत्साहवर्धन हेतु दिली शुक्रिया आपका।
Comment by Samar kabeer on December 13, 2019 at 2:58pm

जनाब विमल शर्मा 'विमल' जी आदाब, अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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