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गीतिका8+8....बरगद पीपल

बरगद पीपल पनघट छूटे 

बालसखा सब नटखट छूटे 

गोपालों की शोख़ ठिठोली 

चौपालों के जमघट छूटे 

बालू के वो दुर्ग महल सब 

तालाबों के वो तट छूटे 

झालर संझा वो चरणामृत 

मंदिर के चौड़े पट छूटे 

मॉलों में क्या कूके कोयल 

अमराई के झुरमुट छूटे

 

धूम कहाँ वो बचपन वाली 

टोली के सब मर्कट छूटे 

हमसे छूटा  गाँव हमारा 

जीने का अब जीवट छूटे

मौलिक व अप्रकाशित  

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Comment

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 12, 2015 at 4:00pm

आ० खुर्शीद सर! क्या आपने बचपन को जीवंत किया है रचना में! क्या तारीफ़ करे शब्द नही मिल रहे!!अनमोल कृति!!आपको अभिनन्दन!!

Comment by Hari Prakash Dubey on March 12, 2015 at 3:49pm

वाह ..आदरणीय खुर्शीद भाई बहुत सुन्दर रचना  , दिल से बधाई आपको ! सादर 

कृपया ध्यान दे...

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