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अहबाब ऐतबार के काबिल नहीं रहे
ये कैसे सर हैं ..! दार के काबिल नहीं रहे

जज़्बात इफ्तेखार के काबिल नहीं रहे
अब नवजवान प्यार के काबिल नहीं रहे

हम बेरुखी का बोझ उठाने से रह गए
कंधे अब ऐसे बार के काबिल नहीं रहे

ज़ागो ज़गन तो खैर, तनफ्फुर के थे शिकार
बुलबुल भी लालाज़ार के काबिल नहीं रहे

पस्पाइयौं के दौर में यलगार क्या करें
कमज़ोर लोग वार के काबिल नहीं रहे

कांटे पिरो के लाये हैं अहबाब किस लिए
क्या हम गुलों के हार के काबिल नहीं रहे

रुसवाइयों की ज़र्ब की शिद्दत से हम अज़ीज़
खुद्दारियौं की मार के काबिल नहीं रहे

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Comment

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Comment by Azeez Belgaumi on May 29, 2011 at 8:43am

Hamsheera Mohatarama Devi Sahiba.. Aadab.. Aap ke comments se baDi himmat afzaayee hoti hai. Aap ka bahut bahut shukriya. Isi taraha nawazte raheN.. Ishwar aap ko khush rakhhe.. Azeez Belgaumi

 

Comment by Devi Nangrani on May 29, 2011 at 8:35am
Azeez ji
Pighalta hua dard bhi siyahi ka kaam karta hai is ahsaas ko har ek lafz zahir kar raha hai. 
aaj Rumi ko pdha; Likha tha raat bhar jago, bahut sari ratein jago jab tak savera nahin hota. Andheron ko cheerkar Roushni apne aap ko zahir karti hai. Aapke aandaze bayan bahut hi umda aur margdarshak hai.
 

Comment by Azeez Belgaumi on May 28, 2011 at 11:07am
Bagi ji... Tajraba ke bajaye.. TABSARA paRheN.. regret the mistake : AZEEZ BELGAUMI
Comment by Azeez Belgaumi on May 27, 2011 at 10:52pm

SARA MISRA JI:

Aaap ki mohabbatouN ka shukriya Sara Misra ji

 

NEMICHAND JI:

Mohataram Nemichand ji bahut bahut shukriya….

BAGI SHB:

Dear bagi ji … aap ne mere kalam par baDa achha tajaraba kiya hai.. Badi khushi hasil huwi.. isi taraha nawazte raheN..

Comment by SARA MISRA on May 27, 2011 at 9:22pm
कांटे पिरो के लाये हैं अहबाब किस लिए क्या हम गुलों के हार के काबिल नहीं रहे !!! behatreen nazam  !!!
Comment by nemichandpuniyachandan on May 25, 2011 at 3:09pm
waah..waah..janaab Azeez belgaumi sahib,umda kalaam ke liye Mubarakbad,Paspaiyon ke dour men yalgaar kya kare,kamzor log waar ke kabil naheen rahe|

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 25, 2011 at 10:12am

अज़ीज़ साहिब, आपको सुनना हमेशा ही सुखद रहा है, आपकी ग़ज़ल एक अलग ही कलेवर लिए होती है, प्रस्तुत ग़ज़ल में भी जिस खूबसूरती से हुस्ने मतला का प्रयोग किया गया है वो काबिले गौर एवं नए फनकारों के लिए सिखने योग्य है, बेरुखी का बोझ वाला शे'र बहुत ही खुबसूरत बन पड़ा है साथ में ..............

कांटे पिरो के लाये हैं अहबाब किस लिए
क्या हम गुलों के हार के काबिल नहीं रहे

आय हाय , क्या नजाकत है , वाह साहिब वाह , ये बुलंद अंदाज, बहुत खूब, पूरी ग़ज़ल की जान है यह शे'र,

यदि मकता की बात न किया जाय तो शायद बात अधूरी रह जाएगी, खुबसूरत मकता , ऐसा लगा कि शायर ने पूरी ग़ज़ल को निचोड़ कर उसका सत मकते के अन्दर डाल दिया है |

इस बेहतरीन और उम्द्दा प्रस्तुति पर दाद कुबूल कीजिये जनाब |  

 

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