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आसमां के हाथ मैले हो गये
ये महल कैसे तबेले हो गये
 
जो खनकते थे कभी कलदार से 
अब सरे बाज़ार धेले हो गये
 
घूमती थी बग्घियाँ किस शान से
आजकल सड़कों पे ठेले हो गये
 
इस शहर में कौन बोलेगा भला 
लोग ख़ामोशी के चेले हो गये
 
देखिये तो छक्के पंजे जब मिले 
कल के नहले आज दहले हो गये
 
अपनी खुद्दारी नज़रिया औ हुकूक 
जान को लाखों झमेले हो गये   

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Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on April 5, 2011 at 9:25am
ashish ji thanx for liking
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 31, 2011 at 1:43am
saahil sahab abhaar
Comment by Saahil on March 31, 2011 at 12:05am
इस शहर में कौन बोलेगा भला 
लोग ख़ामोशी के चेले हो गये
umda khayal!
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 26, 2011 at 11:54pm
shukriya ashish ji
Comment by आशीष यादव on March 25, 2011 at 1:45am
shansar she'ro ki jaandar ghazal ke liye badhai kubul ho.
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 24, 2011 at 11:01pm
shukriya rajesh ji
Comment by राजेश शर्मा on March 24, 2011 at 4:17pm
अच्छी रचना ,बधाई .

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