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महात्मा गाँधी मार्ग से कालीदास मार्ग तक

"महात्मा गाँधी मार्ग से कालीदास मार्ग तक"


भारत भ्रमण पर एक विदेशी,
जो था हिन्दी भाषा का प्रेमी!
एशो नज़ाकत का तहज़ीबी नगर!
'मुस्कराईए कि आप लखनऊ मे हैं'.
मन मे गुनता -गुनगुनाता -मुस्कराता;
खचाड़े रिक्शे का लुफ्त लेता,
गुजर रहा था अभी-
'महात्मा गाँधी मार्ग' से .
सहसा उसे नये टेम्पो पर पढ़ने को मिला-
'देखो मगर प्यार से'
वो कुछ बुदबुदाया फिर मुस्कुराया,
तभी अचानक पास से ही सनसनाती-सन्न से;
एक नयी नवेली ट्रक 'धन्नो' निकली.
विदेशी की नज़र फिसली,
ट्रक के पेन्दे पर लिखा था-
'बुरी नज़र वाले तेरा मुँह क़ाला'.
विदेशी ने अपनी नज़र फेर ली.
सामने पट पर लिखा था-
'काली दास मार्ग'


सत्यम/18.01.1991

मौलिक एवं अप्रकाशित रचना 

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 13, 2013 at 8:12am

डा0 प्राची सिंह जी, सुप्रभात! सादर प्रणाम!!, आपको ‘महात्मा गांधी मार्ग से काली दास मार्ग तक‘ की कविता पसन्द आई... बहुत-बहुत आभार..

Comment by ram shiromani pathak on March 9, 2013 at 7:28pm

बहुत ही रोचक सफ़र लगा यह महात्मा गांधी मार्ग से काली दास मार्ग तक...

हार्दिक बधाई इस रचना पर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 9, 2013 at 3:04am

   :-))))

मेरे जिये शहर लखनऊ ने अपने होने से किसी को सिखाया.. . जय होऽऽऽ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 8, 2013 at 11:59pm

बहुत ही रोचक सफ़र लगा यह महात्मा गांधी मार्ग से काली दास मार्ग तक...

हार्दिक बधाई इस रचना पर 

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