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मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल____Manoj kumar ahsaas

सुबह आयी
तेरे इंतज़ार की खुशबू लेकर
फिर तमाम दिन मुझे तेरा इंतज़ार रहा
शाम आयी
तेरे ना आने की मायूसी लेकर
फिर तमाम रात अंधेरो मे ढूढ़ा है तुझे
और बांधी है उम्मीद अगली सुबह से
मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल
तू कहाँ था?
आज आया है
तो मेरी आँखों में चमक ही नहीं
बुझ गया है तेरा इंतज़ार
जला कर खुद को
तुझको पाने को लगाया था खुद को दाँव पर
ऐसा लगता है
तुझ को पाया है खोकर खुद को
मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल
तू कहाँ था?
साथ लेकर तुझे
होकर जुदा अपनों से
मैं भटकता हूँ जैसे आज रेगिस्तानों में
इश्क़ के कतरे मुकद्दर में कभी थे ही नहीं
चंद समझोते थे
जो तेरी आहटों से
मोजुदगी से
कैद हो गए ज़रूरतो के मकानों में
मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल
तू कहाँ था?
जी मे आता है भगा दू तुझ को
या फिर तुझसे भाग जाऊ कहीं
नहीं है तू हसीन पल जीवन का
तू मेरा वो ही पुराना साथी है
खेलता आया है जो बचपने से साथ मेरे
तेरा नाम दर्द है तू वही तन्हाई है
बस आज इस दुनिया के रंगीन मौसम में
अपनी सूरत बदल कर साथ मेरे
चल रहा है बड़ी कशिश के साथ
शायद खुश है
सुन रहा है मेरी बेचैन आवाज़
के
मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल
तू कहाँ था ?
कहाँ?





मौलिक और अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2015 at 6:55pm

इस प्रयास के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ मनोज अहसासजी. अभिव्यक्ति को कसावट देते रहें. व्याकरण की अशुद्धियों के प्रति सचेत रहना सबसे अधिक आवश्यक है.
शुभेच्छाएँ

Comment by Manoj kumar Ahsaas on July 3, 2015 at 2:04pm
बहुत आभार
नमन
शुक्रिया


सादर
Comment by kanta roy on July 3, 2015 at 10:03am
हर दिल को इंतजार रहता है किसी का शिद्दत से लेकिन इंतजार हद के बाहर निकल जाती है तो बिलकुल ऐसा ही लगता है कि बाद में उसका आना ,पाना पाने सा नहीं लगता है ।
जज्बातों को बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति दी है आपने आदरणीय मनोज कुमार एहसास जी .... बधाई इस सुंदरतम रचना के लिए
Comment by Manoj kumar Ahsaas on July 3, 2015 at 7:49am
आप सभी आदरणीय मित्रों का बहुत आभार
शुक्रिया
मेहरबानी
इस तनहा सफ़र में आप का साथ और सदभावना की बेहद ज़रूरत है
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 3, 2015 at 12:18am

आदरणीय मनोज भाई जी, बहुत ही सुन्दर कविता है ..... हार्दिक बधाई !

Comment by maharshi tripathi on July 2, 2015 at 11:27pm

इश्क़ के कतरे मुकद्दर में कभी थे ही नहीं
चंद समझोते थे
जो तेरी आहटों से
मोजुदगी से
कैद हो गए ज़रूरतो के मकानों में,,,,,,,,,,वाह!!,,अत्यंत सुन्दर,,बधाई आ. Manoj kumar Ahsaas जी |

Comment by shree suneel on July 2, 2015 at 9:43pm
भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति... . अच्छी प्रस्तुति आदरणीय मनोज भाई. बधाई हो!
Comment by Manoj kumar Ahsaas on July 2, 2015 at 9:32pm
बहुत आभार भाई मिश्रा जी
सादर
Comment by Manoj kumar Ahsaas on July 2, 2015 at 9:30pm
आदरणीया परी जी
हार्दिक आभार
Comment by Manoj kumar Ahsaas on July 2, 2015 at 9:29pm
आदरणीय राहुल जी हार्दिक आभार
सर हमे तो शिल्प के विषय कुछ पता नहीं है
बस ऎसे ही लिख दिया
सादर

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