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नहीं बदले हम - डॉo विजय शंकर

समय सरसठ साल
कम नहीं कहलाता है
एक अबोथ शिशु
वयोवृद्ध हो जाता है |
बदले कोई तो दुनियाँ
जहान बदल जाए
न बदले तो जमीं क्या
पावदान न बदल पाये |
बहुत कुछ बदला , नहीं बदला ,
आदमी का आदमी के प्रति रुख
नहीं बदला आदमी का
आदमी के प्रति व्यवहार |
बदले हैं तो उपकरण ,
कपड़े और कीमतें ,
सत्ता के नायक और आका
सत्ता के गलियारों के लोग |
नहीं बदली हमारी दृष्टि ,
न ही हमारी सोच |
सरकार हम बन गए ,
सरकार हम दे न पाये |
आजाद हम हो गए,
आजादी हम दे न पाये |

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Views: 580

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Comment by Dr. Vijai Shanker on August 18, 2014 at 12:40pm
कविता तो आपकी सुसंगति में ही सुगठित होगी , साथ बनाये रखिये और ऐसे ही मार्ग दर्शाते रहिये मैं भी प्रयास करूंगा , आदरणीय सौरभ जी ,
सादर .

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 18, 2014 at 12:19pm

मेरे कहे को मान देने के लिए सादर धन्यवाद, आदरणीय.  वस्तुतः मैं  आपके तथ्य से अधिक आपकी कविता के लिहाज पर बातें कर रहा था.

सादर

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 18, 2014 at 12:14pm
आदरणीय सौरभ जी,
आपकी हार्दिक बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद , ह्रदय से .
आपके इंगित और सन्देश , दोनों समझ में हैं . हमारा उद्देश्य भी इंगित करना और सन्देश देना ही होता है , विषय इतना व्यापक है कि कथ्य में कुछ भी लिखा जाए कितना भी लिखा जाए , बहुत कुछ रह ही जाएगा . मैं वैसे भी छोटे-छोटे टुकड़ों में ही लिखता हूँ ताकि अधिक से अधिक लोग चलते-चलते भी एक नज़र डाल लें . प्रसंगतः , एक बात आपके भी ध्यान में आती होगी कि कारगर हो जाए तो एक शब्द भी काफी है , वरना कितने ग्रन्थ पड़े हैं , बस पड़े हैं , जो पढ़ते हैं वो लागू कर नहीं पाते , जो लागू कर सकते हैं वो पढ़ते नहीं , दोनों में कोई तालमेल नहीं .
आपकी पारखी नज़र से कमियां झूट जाएँ ,यह भी तो संभव नहीं , आपके सुझाव सदैव ध्यान देने योग्य होते हैं , मैं भी अवश्य ध्यान दूंगा .
बहुत बहुत धन्यवाद .
सादर .

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 18, 2014 at 11:28am

प्रस्तुति के तथ्य के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय विजय शंकरजी.

किन्तु आपके तथ्य के प्रस्तुतीकरण यानि कथ्य के तौर पर इस रचना को अभी बहुत कसना-सधना है. 

विश्वास है कि आप मेरे सकारात्मक इंगितों और संदेश के मर्म को समझेंगे.
सादर

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 18, 2014 at 8:32am
आपके विचारों से मैं सहमत हूँ , बधाई हेतु धन्यवाद आदरणीय विजय निकोर जी .
Comment by vijay nikore on August 18, 2014 at 3:20am

ऐसा है कि हम मानव प्राय: परिवर्तन लाना चाहते हैं, परन्तु, तब तक जब तक उस परिवर्तन से हमारे अपनी आर्थिक या निजि स्थिति में कोई कमी न आए।

सामयिक विषय पर सुन्दर रचना गढ़ी है। बधाई, आदरणीय विजय जी। 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 17, 2014 at 8:08pm
बहुत सही पकड़ है आपकी आदरणीय लक्षमन प्रसाद लाडीवाला जी , बधाई के लिए ह्रदय से धन्यवाद .
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 17, 2014 at 6:26pm

स्व+तंत्र = स्वतंत्र हम हो गए सड़सठ साल हो गए पर दे न पाए स्वतंत्रता | सुन्दर और चिन्तन परक रचना के लिए बधाई 

डॉ विजय शंकर जी | सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 16, 2014 at 9:08pm
आदरणीय सविता मिश्रा जी , बहुत बहुत धन्यवाद .
Comment by savitamishra on August 16, 2014 at 7:29pm

bahut khubsurt _/\_

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