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मुद्दा भुनाने के लिए होता है--- डॉo विजय शंकर

बात करना , खूब बात करना ,
मुद्दे की बात कभी मत करना ,
मुद्दे की बात करोगे ,
अकेले रह जाओगे ,
फिर कहाँ जाओगे ,
लौट के ( बुद्धू ) फिर वहीँ आओगे।

मुद्दे के आस- पास रहना ,
उसके पास ही नाचना ,
वहीँ गाना , वहीँ बजाना ,
जब - जब मौक़ा मिले ,
मुद्दे को भुनाना , बस .
मुद्दे को खुद कभी नहीं उठाना ,
वरना खुद उठ जाओगे ,
मुद्दे को फिर भी वहीँ पाओगे।

मुद्दा भुनाने के लिए होता है,
निपटाने के लिए नहीं होता है |
जो थोड़ा हट के होते हैं
वही दुनियाँ में ख़ास होते हैं |
मुद्दे से वो भिड़ते नहीं ,
समस्या को वो समझते हैं ,
डट के सामना करते रहो
लोगों से यही अपील करते हैं ,
लोग समस्या से भिड़ते रहें ,
इसका मतलब समझते हैं ,
मुद्दा-समस्या-संतुलन एक सिद्धांत है,
कैसे उपयोग हो इसका ,समझते हैं ॥
मुद्दे-मुद्दे को खूब समझते हैं ,
खूब समझते हैं , इसीलिये
उनकीं बात कभी नहीं करते हैं ||

मौलिक एवं अप्रकाशित
डॉo विजय शंकर

Views: 642

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on February 3, 2015 at 6:43pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , आपके इस यथार्थवादी कविता को स्वीकार करने लिए आभार, आपकी सद्भावनाओं हेतु ह्रदय से बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 3, 2015 at 5:50pm

बढिया बात कही , आदरणीय सच में हो तो यही रहा है बरसों से । आपको हार्दिक बधाइयाँ , आ. विजय भाई जी ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 3, 2015 at 10:46am
आदरणीय खुर्शीद खैरादी जी , रचना स्वीकार कर पसंद करने के लिए आपका आभार , आपकी सद्भावनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद। सादर।
Comment by khursheed khairadi on February 3, 2015 at 10:07am

आदरणीय विजयशंकर जी ,सुन्दर प्रस्तुति है ,हार्दिक अभिनन्दन |सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 3, 2015 at 10:03am
आदरणीय कृष्ण सिंह पेला जी , रचना पसंद आई , आभार , बधाई हेतु भी धन्यवाद। सादर।
Comment by Krishnasingh Pela on February 3, 2015 at 12:20am
वाह ! बहुत ख़ूब ।
मुद्दे को खुद कभी नहीं उठाना ,
वरना खुद उठ जाओगे ,
मुद्दे को फिर भी वहीँ पाओगे।

मुद्दा भुनाने के लिए होता है,
निपटाने के लिए नहीं होता है |
बधाई क़ुबूल कीजिए बेहतरीन कविता के लिए आदरणीय !
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 2, 2015 at 10:38pm
रचना को मान देने बहुत बहुत आभार आदरणीय सोमेश कुमार जी , सादर।
Comment by somesh kumar on February 2, 2015 at 10:28pm

बात करना , खूब बात करना ,
मुद्दे की बात कभी मत करना ,
मुद्दे की बात करोगे ,
अकेले रह जाओगे ,
फिर कहाँ जाओगे ,
लौट के ( बुद्धू ) फिर वहीँ आओगे।

khubsurt rajnaitik tnz

Comment by Dr. Vijai Shanker on February 2, 2015 at 9:18pm
प्रिय मिथिलेश वामनकर जी, रचना को सप्रशस्ति स्वीकार करने के लिए बहुत बहुत आभार। बधाई के लिए ह्रदय से धन्यवाद।
Comment by Dr. Vijai Shanker on February 2, 2015 at 9:03pm
आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, रचना को स्वीकार करने और उसके लिये प्रशस्ति के शब्दों की लिए बहुत बहुत आभार , बधाई हेतु सादर धन्यवाद।

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