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विवशता (लघुकथा) : डॉo विजय शंकर

बहुत ही व्यस्त कार्यक्रम था आज मंत्री जी का। सारे दिन शैक्षिक गुणवत्ता की कायर्शाला में अधिकारियों , शिक्षाविदों के साथ वाद-विवाद में जबरदस्त सक्रिय रहे माननीय मंत्री जी, बार बार यही दोहराते रहे , " सदियों से हम विश्व-गुरु रहें हैं, हम ऐसी शिक्षा दें कि कोई भी शिक्षा के लिए विदेश न जाना चाहे।"
शाम घर जाते कार में पी ए से बता रहे थे:

"हफ्ते भर बाहर रहूंगा, रात दिल्ली निकल रहा हूँ I कल अमेरिका की फ्लाइट है, बेटे को हॉस्टल छोड़ कर आना है।.कहाँ कहाँ का जुगाड़ लगाया है तब एडमिशन मिला है इस बार। "
पी ए ने भी पुए पर चीनी रखी , " सर बस , अब देखियेगा , बाबा कुछ ही साल में पूरे अंग्रेज बन के लौटेंगे। "
" देखो , ईश्वर सुन ले हमारी " , गहरी सांस छोड़ते हुए कहा मंत्री जी ने।

मौलिक एवं अप्रकाशित
डॉo विजय शंकर

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Comment by Dr. Vijai Shanker on April 26, 2015 at 6:16pm
आदरणीय विजय निकोर जी, आपको लघु-कथा अच्छी लगी आपका बहुत बहुत आभार , बधाई के लिए ह्रदय से बधाई। सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on April 26, 2015 at 6:14pm
प्रिय कृष्ण मिश्रा जी, आपको लघु-कथा अच्छी लगी आभार , आपने प्रस्तुति की शैली पर भी गंभीरता से ध्यान दिया और उसे भी पसंद किया उसके लिए एवं बधाई के लिए ह्रदय से बधाई। सादर।
Comment by vijay nikore on April 26, 2015 at 6:04pm

दोहरी मानसिकता का सटीक चित्रण। हार्दिक बधाई, आदरणीय विजय जी।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 26, 2015 at 5:14pm

आदरणीय Dr. Vijai Shanker सर! उम्दा लघुकथा पर हार्दिक बधाई! आपकी व्यंग्य में कटाछ शैली ने कथा को और भी मारक बना दिया है!

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 26, 2015 at 10:31am
आदरणीय शिज्जु शकूर जी , आपको रचना अच्छी लगी , धन्यवाद, आपकी सद्भावनाओं हेतु भी धन्यवाद, सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on April 26, 2015 at 9:31am

ये दोहरी मानसिकता उच्च वर्ग की परिचायक बन गई है अच्छी लघुकथा है आदरणीय डॉ विजय शंकर जी

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 24, 2015 at 11:46pm
लघु-कथा को स्वीकृति एवं मान देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय राजकुमार आहूजा जी , आपके सद्विचारों एवं बधाई के लिए बहुत बहुत धन्वाद , सादर।
Comment by rajkumarahuja on April 24, 2015 at 9:14pm

 स्वार्थ सिद्धि , दोहरी-मानसिकता, नैतिक-पतन आज हमारी राजनीति के पर्याय बन चुके हैं ! लोभ की पराकाष्ठा ने इंसान को हैवान बना दिया है ! एक अच्छी लघु-कथा माननीय डा. विजय शंकर जी    साधुवाद ! 

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 24, 2015 at 5:32pm
आदरणीय मोहन सेठी जी , रचना की स्वीकृति के लिए आपका आभार, बधाई के लिए सादर धन्यवाद।
Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 24, 2015 at 1:35pm

आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी ...बिलकुल सत्य है ये कथन .....हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और ...बधाई इस रचना के लिये ..सादर 

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