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पिंजड़ा -- डॉo विजय शंकर

पिंजड़ा भी ,
एक अजीब बंधन है ,
दाना भी , पानी भी , बस ,
बंद पंछी उड़ नहीं सकता।
हौसलों से कहते हैं कि
क्या कुछ हो नहीं सकता ,
हो सकता है , बस पंछी ,
पिंजड़ा लेकर उड़ नहीं सकता।
कितने आज़ाद हैं हम ,
फिर भी उड़ नहीं पाते ,
मुक्त हो नहीं पाते ,
उन्मुक्त होकर जी नहीं पाते ,
बाहर से आज़ाद हैं , बस ,
कुछ पिंजड़े हैं हमारे अंदर ,
बाँधे हैं , कुछ ढीले , कुछ कस कर।
रूढ़ियाँ कब बन जाती हैं बेड़ियाँ ,
बंधे रह जाते हैं हम , पता नहीं चलता ,
एक जकड़न में , एक अकड़न में ,
कि दाना-पानी , सब है इसी में ,
बस इसी जकड़ - अकड़ से निकल लें
तो मुक्ति, वरना आज़ाद
कोई और कर नहीं सकता।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 770

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Comment by Dr. Vijai Shanker on August 3, 2016 at 8:27am
" उसे हम पर तो देते हैं मगर उड़ने नहीं देते // हमारी बेटी बुलबुल है मगर पिंजरे में रहती है "
यह पंक्ति फेसबुक से ली है , आज ही , किसी श्री रहमान मुस्सावीर साहब ने एक पंक्ति की यह कविता लिखी है।
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 3, 2016 at 7:52am
आदरणीय लक्षमण रामानुज लाडिवाला , रचना को स्वीकृति प्रदान करने हेतु आपका ह्रदय से आभार एवम धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 3, 2016 at 7:52am
आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी , रचना को मान देने हेतु आपका ह्रदय से आभार एवम धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 3, 2016 at 7:45am
आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , प्रस्तुत अतुकांत कविता पर आपकी उपस्थिति , उसे स्वीकृति प्रदान कर प्रशस्ति प्रदान करने हेतु आपका ह्रदय से आभार एवम धन्यवाद , सादर।
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 2, 2016 at 3:56pm
आजाद होकर भी आजाद नहीं | सही कहा अपने कई तरह की बेड़ियों में आज भी जकड़ें है | सुंदर प्रस्तुति
Comment by Shyam Narain Verma on August 2, 2016 at 11:07am
सार्थक सृजन के लिए बहुत बहुत बधाई आपको । ..सादर 
Comment by Samar kabeer on August 2, 2016 at 10:11am
आली जनाब डॉ.विजय शंकर जी आदाब,हम आज़ाद होकर भी आज़ाद नहीं,बहुत उम्दा कटाक्ष हैं आपकी कविता में पढ़ कर आनन्द आया,बधाई स्वीकार करें इस शानदार प्रस्तुति पर ।

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