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ऊंचे चमकदार आदर्श -- डॉo विजय शंकर

ऊंचे आदर्श ,
बहुत ऊंचे , पहुँच से ऊपर ,
झाड़फानूस की तरफ ,
रौशन भी होते हैं , चमक के साथ ,
बिजली आती रहे तब ,
और हैं भी केवल उन घरों में
जो इतने बड़े हैं कि
झाड़फानूस लगवा सके।
पर वे भी बस उसकी चमक से
उपकृत , चमत्कृत होते रहते हैं ,
अधिकांशतः किसी के आने पर
उसे रौशन करते हैं , दिखाने के लिए।
सामान्यतः तो आदमी मामूली चप्पलों में ही
चलता है , उसका जीवन तो उन्हीं में बीतता हैं ।
उनमें से बहुतों ने तो झाड़फानूस देखे भी नहीं हैं ,
उसके आदर्श तो वही हैं जो उसे चलायमान बनाये रखें ।
सजे हुए आदर्श , कितने भी चमकदार क्यों न हों
किस काम के , किसी के भी।

मौलिक एवं अप्रकाशित
डॉo विजय शंकर

Views: 502

Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2015 at 7:11pm
आदरणीय सौरभ पांडे जी , रचना को आपकी स्वीकृति हेतु आपका आभार एवं शुभकामनाओं हेतु ह्रदय से धन्यवाद। सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2015 at 7:08pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , कविता पर आपकी उच्च प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभार, रचना की स्वीकृति हेतु आपको धन्यवाद। सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2015 at 7:06pm
आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी , कविता पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभार, रचना की स्वीकृति हेतु आपको धन्यवाद। मुद्रण की ध्यानाकर्षण के लिए भी आभार। सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2015 at 7:03pm
आदरणीय सुश्री काँता रॉय जी , कविता के आपके सारगर्भित विश्लेषण के लिए ह्रदय से आभार, रचना की स्वीकृति हेतु आपको धन्यवाद। सादर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2015 at 11:54pm

इस अभिव्यक्ति के लिए शुभकामनाएँ, आदरणीय विजय शंकरजी.

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 12:16pm

आदरणीय विजय भाई , आपकी रचना ने दीवार फिल्म का प्रसिद्ध डायलाग याद दिला दिया --- '' उफ्फ ! ये तुम्हारे आदर्श , इनको गूँध के दो वक़्त की रोटी भी नही बनाई जा सकती , रवि ''   लाजवाब रचना के लिये हार्दिक बधाई स्वीकार करें ॥

Comment by Hari Prakash Dubey on June 24, 2015 at 5:41pm

 आदरणीय  डॉo विजय शंकर सर , बहुत सुन्दर , सोचने पर मजबूर  कर देती है  आपकी  यह  रचना ऊंचे आदर्श/ बड़े घर / आम आदमी / मामूली  चप्पल ....शानदार   , बस तीसरी पंक्ति  में झाड़फानूस की तरफ/ की जगह  क्या तरह होना  चाहिये ? सादर   

Comment by kanta roy on June 24, 2015 at 11:03am
बहुत ही उम्दा कहा है आपने " ऊँचे चमकदार आदर्श " को । झाडफानूसों में टंगे हुए कीर्तीमान कायम करने के लिए महज़ बनाये है लोगों नें अपने अपने चमकीले आदर्श .... उन आदर्शों का क्या मोल जो सिर्फ किताबों की पंक्तियों में मोती से सजे रहे ... सच्चा आदर्श कायम करने में सुख का त्याग करना पडता है ... सहना पडता है कई बार फुटपाथी बनने का इल्ज़ाम लेकिन आपकी यह बात ही सौ बातों की एक है कि ......"सजे हुए आदर्श , कितने भी चमकदार क्यों न हों
किस काम के , किसी के भी ।" .... नमन आपके इस अभिव्यक्ति को

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