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हक़ की लड़ाई (लघुकथा)- डॉo विजय शंकर

दोनों बुराई के लिये लड़ रहे थे, एक दूसरे पर खूब कीचड़ उछाल रहे थे ।
देखने वालों ने समझा दोनों बुराई मिटा के रहेंगे ,
जब कि वो दोनों बुराई पर अपना अपना हक़ जता रहे थे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on July 31, 2015 at 9:00am
आपका आभार एवं धन्यवाद , आदरणीय सुश्री रेखा मोहन जी , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 26, 2015 at 8:39am
आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , आपका बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 26, 2015 at 8:37am
आदरणीय ओम प्रकाश क्षत्रीय जी , आपका आभार एवं धन्यवाद, टाइप त्रुटि की ध्यानाकर्षण आपका , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 26, 2015 at 8:18am

आदरणीय विजय भाई , आपकी कथा एक कटु सत्य कहती लगी , बुराइयों पर अपना अपना हिस्सा पाने की ही लड़ाई चल रही है अभी । हार्दिक बधाई आपको ।

Comment by Omprakash Kshatriya on July 26, 2015 at 8:14am
आदरणीय विजय शंकर जी
प्रणाम ।
इस कसी हुई शानदार रचना के लिए बधाई ।
केवल जाता को जता कर लीजिएगा ।
Comment by kanta roy on July 25, 2015 at 9:02pm
जी , बिलकुल सही कह रहे है आदरणीय मिथिलेश जी , यह कालजयी रचना हुई है । ऐसी दृष्टि बहुत ही कम रचनाओं में देखने को मिलती है । ये गूढ चिंतन का सार है । लघुकथा के मानकों पर बिलकुल खडी उतरने वाली अद्वितीय रचना है । बधाई आदरणीय डा. विजय शंकर जी एकबार फिर से ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 25, 2015 at 8:30pm

कुछ रचनाएँ सभी  देश, काल और वातावरण के सापेक्ष कालजयी ही है. इस रचना को उसी श्रेणी में माना जाना उचित प्रतीत होता है...

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 25, 2015 at 8:06pm
आदरणीय विनोद जी , प्रसन्नता है , आप समझ चुके हैं , विषय गम्भीर हो तो इशारा ही काफी होता है। बहुत विस्तार में जाने की जरूरत शायद नहीं हैं , न हैं लघु-कथा की आवश्यकता है. आभार , आपका स्वागत है। सादर।
Comment by विनोद खनगवाल on July 25, 2015 at 7:53pm

आदरणीय डाॅ. विजय शंकर जी। आपकी बातें सही है लेकिन किस बुराई के बारे में कहा गया है यह कुछ स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। कहीं संसद में हो रहे गतिरोध भाजपा और कांग्रेस के आपस में एक दूसरे पर कीचड उछालने पर तो यह कथा नहीं है? लघुकथा किसी घटना या दुर्घटना में से ही तो बनती है। अगर वो स्पष्ट हो जाए तो कथा को समझने में बहुत मदद मिलेगी। सादर

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 25, 2015 at 7:14pm
आदरणीय विनोद खनगवाल जी आपकी टिप्पणी विचारणीय है पर कथानक बिलकुल सरल एवं स्पष्ट है , प्रायः बुराई के लिए एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे लोग बुराई के समापन के लिए नहीं लड़ते वरन दूसरे की बुराई की तुलना में स्वयं की गई बुराई को नगण्य बताते हैं और बुराई करने के अधिकार पर अपना स्वामित्व भी जताते हैं. विचार करें , कहीं ऐसा है अथवा नहीं ?
सादर।

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