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हक़ की लड़ाई (लघुकथा)- डॉo विजय शंकर

दोनों बुराई के लिये लड़ रहे थे, एक दूसरे पर खूब कीचड़ उछाल रहे थे ।
देखने वालों ने समझा दोनों बुराई मिटा के रहेंगे ,
जब कि वो दोनों बुराई पर अपना अपना हक़ जता रहे थे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by विनोद खनगवाल on July 25, 2015 at 3:40pm

आदरणीय डाॅ. विजय शंकर जी। यह लघुकथा तो किसी एंगल से नजर नहीं आ रही है। कुछ स्पष्ट नहीं है कथानक। कविता तत्व ज्यादा हावी हो गया है।

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2015 at 10:13am
आदरणीय सुश्री कांता रॉय जी लघु-कथा पर आपकी स्वीकृति एवं उन्मुक्त प्रशस्ति हेतु ह्रदय से बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2015 at 10:11am
आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी लघु-कथा पर आपकी स्वीकृति एवं प्रशस्ति हेतु ह्रदय से बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2015 at 10:10am
आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी लघु-कथा पर आपकी स्वीकृति एवं उन्मुक्त प्रशस्ति हेतु ह्रदय से बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2015 at 10:09am
आदरणीय सुश्री राजेश कुमार जी लघु-कथा पर आपकी स्वीकृति एवं प्रशस्ति हेतु ह्रदय से बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2015 at 10:08am
आदरणीय विनय कुमार सिंह जी लघु-कथा पर आपकी स्वीकृति एवं प्रशस्ति हेतु ह्रदय से बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2015 at 10:07am
आदरणीय सुशील सरना जी लघु-कथा पर आपकी स्वीकृति एवं प्रशस्ति हेतु ह्रदय से बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2015 at 9:43am
आदरणीय शिज्जु जी लघु-कथा स्वीकृति एवं प्रशस्ति हेतु ह्रदय से बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on July 24, 2015 at 9:42am
लघु-कथा स्वीकृति एवं प्रशस्ति हेतु ह्रदय से बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद प्रिय मिथिलेश वामनकर जी , सादर।
Comment by kanta roy on July 24, 2015 at 8:54am
वाह !!!!!!! क्या सुंदर बात हुई है ! हम पढकर दंग हो गये । लोगों का समझना...... और उनके करने के पीछे का सच........ क्या खूब खींचा है मनोभावों को इन दो - तीन पंक्तियों में । इस गजब की अभिव्यक्ति के लिए नमन आपको आदरणीय डा. विजय शंकर जी ।

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