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रक्त पूर्ति भी ज़रूरी है

क्षुद्र बुद्धि और है पराक्रम भी क्षुद्र आज ज्ञान से मनुष्य ने बना ली बड़ी दूरी है
मायावी प्रपंच से प्रभावित हैं जन सभी कलि पाश दृढ हुआ यही मजबूरी है
शाश्वत परम्पराएं त्यागने लगे तभी तो धनवान हुए किन्तु साधना अधूरी है
खप्पर भवानी कालिका का रिक्त हो रहा है शत्रु शीश काट रक्त पूर्ति भी ज़रूरी है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
सर्वथा मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 19, 2013 at 4:06pm

बहुत बहुत आभार  D P Mathur  जी 

Comment by D P Mathur on June 19, 2013 at 8:01am

आदरणीय वाजपेयी जी सच धनवान तो येन केन प्रकरेण हो ही जाते हैं पर साधना का ज्ञान अंतिम समय तक अधूरा ही रह जाता है यही अधिकांश मानवो के जीवन की सच्चाई है आपको बधाई!

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 17, 2013 at 10:39am

बहुत बहुत आभार विजय मिश्र जी अभिभूत कर दिया आपने मम्मट की उक्ति का स्मरण हो आया आपकी प्रतिक्रिया से.....आचार्य मम्मट ने भी यही कहा है 'नियतिकृत नियम रहिताम ह्लादैकमयीमनन्य परतन्त्राम नव रस रुचिराम निर्मित मा दधती भारती कवेर्जयति' पुनः आभार 

Comment by विजय मिश्र on June 15, 2013 at 7:03pm
"शाश्वत परम्पराएं त्यागने लगे तभी तो धनवान हुए किन्तु साधना अधूरी है |" - इस पंक्ति ने तो मानो इस 'भ्रष्टयुग' की [यह तो ब्रह्मा की भी कल्पना से आगे जा रहा है]पूरी व्याख्या ही कर दियी है .आजका आदमी सचमुच शाश्वत से दूर जाकर अपनी निरीहता पर रो भी रहा है और भटकन में बिश्वास भी करता है .ऋषिओं के लाखों वर्ष की तपस्या ने जो अमर फल प्राप्त किये ,जिसमें देवत्व सिद्धि की शक्ति है वही है परम्परा क्योंकि इन्हें साधकर मनुष्य परम के पार जाने की भी अंतर्दृष्टि पा लेता है .मन मोह लिया आपकी इस पंक्ति ने .साधुवाद आशुतोषजी .
Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 14, 2013 at 9:49pm

हार्दिक आभार Kewal Prasad जी

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 14, 2013 at 8:57pm

आ0 आशुतोष भाई जी,  अतिशय सुन्दर छन्द।  पापियों का पाप से उध्दार भी जरूरी है।  शानदार भावाभिव्यक्ति।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।    सादर,

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 14, 2013 at 3:58pm

बहुत बहुत आभार aman kumar जी

Comment by aman kumar on June 14, 2013 at 10:53am

शाश्वत परम्पराएं त्यागने लगे तभी तो धनवान हुए किन्तु साधना अधूरी है 
खप्पर भवानी कालिका का रिक्त हो रहा है शत्रु शीश काट रक्त पूर्ति भी ज़रूरी है |

आप ने धार्मिक मन्येताओ को सामाजिक प्रपंचो से जोडकर अपनी विशेस लेखन कला की छाप दी है ! 

Comment by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 14, 2013 at 10:06am

बहुत बहुत आभार कुंती जी 

Comment by coontee mukerji on June 14, 2013 at 12:32am

खप्पर भवानी कालिका का रिक्त हो रहा है शत्रु शीश काट रक्त पूर्ति भी ज़रूरी है..........बहुत  सटीक कलयुग का वर्णन किया है आशुतोश जी .सादर / कुंती  .

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