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"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 190 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा नौजवान शायर अज़हर नवाज़ साहब की ग़ज़ल से लिया गया है।
तरही मिसरा है:
“मैं ने जो वक़्त निकाला था शिकायत के लिए”
बह्र 2122, 1122, 1122, 112/22

अर्थात् फ़ायलातुन्, फ़ियलातुन्, फ़ियलातुन्, फ़यलुन् है।
रदीफ़ है “के लिए” और क़ाफ़िया है ‘अत (अ के पूर्व स्वर के साथ त’)। ध्यान दें कि रदीफ़ में “के” गिराकर पढ़ा जायेगा।
ग़ज़ल में प्रयुक्त क़ाफ़िया शब्दों के अतिरिक्त कुछ अन्य उदाहरण हैं आदत, चाहत, इज़्ज़त, उलफ़त, शुह्रत आदि।
मूल ग़ज़ल यह है:


मिलते जुलते हैं यहाँ लोग ज़रूरत के लिए
हम तिरे शहर में आए हैं मोहब्बत के लिए


वो भी आख़िर तिरी तारीफ़ में ही ख़र्च हुआ
मैं ने जो वक़्त निकाला था शिकायत के लिए


मैं सितारा हूँ मगर तेज़ नहीं चमकूँगा
देखने वाले की आँखों की सुहूलत के लिए


तुम को बतलाऊँ कि दिन भर वो मिरे साथ रहा
हाँ वही शख़्स जो मशहूर है उजलत के लिए


सर झुकाए हुए ख़ामोश जो तुम बैठे हो
इतना काफ़ी है मिरे दोस्त नदामत के लिए


वो भी दिन आए कि दहलीज़ पे आ कर 'अज़हर'
पाँव रुकते हैं मिरे तेरी इजाज़त के लिए


पूरी ग़ज़ल देने का मेरा स्पष्ट उद्देश्य यह है कि इसके एक-एक शेर को देखें किस खूबसूरती से दोनों पंक्तियों का संबंध स्थापित किया जाता है। ग़ज़ल न तो केवल रदीफ़, काफ़िया और बह्र मात्र का निर्वाह हाथी है और न ही इनका निर्वाह कर किसी तरह दो मिसरे रख देने का। पहली पंक्ति में जो बात कही उसका स्पष्ट संबंध दूसरी पंक्ति से होना आवश्यक होता है। केवल एक ही भिन्न् स्थिति हो सकती है और वह यह है कि यदि पहली पंक्ति में बात पूरी न हो तो दूसरी पंक्ति उस बात को इस तरह पूरी करती है कि सुनने वाला वाह कहने से न रुक सके।
मुशायरे की अवधि केवल दो दिन होगी ।

मुशायरे की शुरुआत दिनांक 25 अप्रैल दिन शनिवार के प्रारंभ के साथ हो जाएगी और दिनांक 26 अप्रैल दिन रविवार के समाप्त होते ही मुशायरे का समापन कर दिया जायेगा.
नियम एवं शर्तें:-
"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" में प्रति सदस्य अधिकतम एक ग़ज़ल ही प्रस्तुत की जा सकेगी |
एक ग़ज़ल में कम से कम 5 और ज्यादा से ज्यादा 11 शेर ही होने चाहिए |
तरही मिसरा मतले को छोड़कर पूरी ग़ज़ल में कहीं न कहीं अवश्य इस्तेमाल करें | बिना तरही मिसरे वाली ग़ज़ल को स्थान नहीं दिया जायेगा |
शायरों से निवेदन है कि अपनी ग़ज़ल अच्छी तरह से देवनागरी के फ़ोण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन-बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें | इमेज या ग़ज़ल का स्कैन रूप स्वीकार्य नहीं है |
ग़ज़ल पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे ग़ज़ल पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं | ग़ज़ल के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें |
वे साथी जो ग़ज़ल विधा के जानकार नहीं, अपनी रचना वरिष्ठ साथी की मार्गदर्शन प्राप्त कर ही प्रस्तुत करें। नियम विरूद्ध, अस्तरीय ग़ज़लें और बेबहर मिसरों वाले शेर बिना किसी सूचना से हटाये जा सकते हैं जिस पर कोई आपत्ति स्वीकार्य नहीं होगी। ग़ज़ल केवल स्वयं के प्रोफ़ाइल से ही पोस्ट करें, किसी सदस्य की ग़ज़ल किसी अन्य सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाए ।
विशेष अनुरोध:-
सदस्यों से विशेष अनुरोध है कि ग़ज़लों में बार बार संशोधन की गुजारिश न करें | ग़ज़ल को पोस्ट करते समय अच्छी तरह से पढ़कर टंकण की त्रुटियां अवश्य दूर कर लें| मुशायरे के दौरान होने वाली चर्चा में आये सुझावों को एक जगह नोट करते रहें और संकलन आ जाने पर किसी भी समय संशोधन का अनुरोध प्रस्तुत करें |
मुशायरे के सम्बन्ध में किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है....
"OBO लाइव तरही मुशायरे" के सम्बन्ध मे पूछताछ
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"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" के पिछ्ले अंकों को पढ़ने हेतु लिंक पर क्लिक करें।
मंच संचालक
तिलक राज कपूर
(वरिष्ठ सदस्य)
ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम

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 स्वागतम 

सादर अभिवादन।

सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिए
कर्बला   साथ   चले   कौन  शहादत  के  लिए।।
*
कर रहे ख़ून सभी रोज़ ही दौलत के लिए
नेकियाँ तोल रहा कौन क़यामत के लिए।।
*
कर्म से मोड़ के मुँह हाल ये खुद का है किया
दोष औरों को न दे अपनी जहालत के लिए।।
*
नफरतें  दिल  में  लिए  लोग  जिए जाते हैं
वक्त ही शेष कहाँ जग में मोहब्बत के लिए।
*
साँस अंतिम ये मेरी देखने तुझको है रुकी
मौत ठहरी है कहाँ सिर्फ इजाज़त के लिए।।

*
हाल देखा जो  तेरा  काट  लिया रो के सनम
मैं ने जो वक्त निकाला था शिकायत के लिए ।।
*
मौलिक/अप्रकाशित

2122, 1122, 1122, 112/22

सर झुका देते हैं हम उसकी इबादत के लिए

एक दिल चाहिए हमको तो मुहब्बत के लिए 1

मुझसे पूछा ही नहीं जिसने इज़ाज़त के लिए

क्या सज़ा देंगे उसे आप हिमाक़त के लिए2

जोड़ के रखता है वो इसको ज़रूरत के लिए

क्या नहीं करता है इंसान भी दौलत के लिए 3

शाम का वक़्त कभी साथ गुज़ारे हम भी

हमने माँगीं है दुआ बस तेरी फ़ुर्सत के लिए 4

हक़बयानी से नहीं हमने कभी मुंह मोड़ा

हम लड़े हैं किसी भी हाल में इज़्ज़त के लिए 5

फ़ायदा इससे किसी का नहीं होता यारो

और कुछ भी नहीं ये जंग है दहशत के लिए 6

आपने हमको नवाज़ा है बड़ी इज़्ज़त से

हम भी तैयार “रिया” रहते हैं ख़िदमत के लिए 7

गिरह-

आपकी लेटलतीफ़ी में वो भी ज़ाया हुआ

“मैंने जो वक़्त निकाला था शिक़ायत के लिए”

आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।

इल्म गिरवी है अभी अपनी जहालत के लिए

ढूँढ लो क़ौम नयी अब तो बग़ावत के लिए

अब अगर नाक कटानी ही है हज़रत के लिए

फ़िक्र करिये न कभी आप तो क़ीमत के लिए

है ये दावा वो करे काम बहुत हम सब से

क्या कहूँ उनकी ला हासिल सी मशक़्क़त के लिए

तेरी यादों ने मेरा वो भी समय छीन लिया

'मैंने जो वक़्त निकाला था शिकायत के लिए'

बोलना सच कि है अपराध तेरे शह्र में 'जय'

मुझ को फांसी पे चढ़ा दे मेरी जुरअत के लिए

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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